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शनिवार, 11 अप्रैल 2015 00:00

ईरानी सिनेमा में साहित्यिक पहलू

ईरानी सिनेमा में साहित्यिक पहलू

हमने यह बताया था कि सिनेमा और साहित्य के संपर्क सदैव ही रोचक विषय रहा है। इसी प्रकार सिनेमा के कौशल और साहित्य के बयान की शैली ने एक दूसरे को आपस में जोड़ दिया है।

 

ईरान में सिनेमा के आरंभिक वर्षों में साहित्य के साथ उसका पहला संयोग और उसके आरंभिक नमूने, ईरान के क्लासिक साहित्य और प्रेमपूर्ण कहानियों पर आधारित थे। किन्तु क्रान्ति के बाद फ़िल्मकारों का दृष्टिकोण साहित्य के प्रति बहुत व्यापक हो गया और यह दायरा ईरान के साहित्य की परिधि से निकल कर विश्व साहित्य तक पहुंच गया।

इस बीच निर्देशकों को दो वर्गों में बाटा जा सकता है। पहला गुट उन निर्देशकों का है जो केवल कहानी पर ध्यान केन्द्रित करते थे जबकि दूसरा गुट उन निर्देशको का था जो कहानी के अलावा अपने व्यक्तिगत अनुभव को शामिल करते थे ताकि उसे स्थानीय रंग दे सकें। पिछली कड़ी में हमने इस बात का उल्लेख किया था कि ईरानी सिनेमा में साहित्यिक संयोग का कामयाब नमूना फ़िल्म नाख़ुदा ख़ुर्शीद है जिसके निर्माता नासिर तक़वायी हैं। इसी प्रकार साहित्यिक संयोग की एक और सफल फ़िल्म दारयूश मेहरजूयी की है।   

 

 

आपको याद होगा कि कुछ कार्यक्रम पहले इस ईरानी निर्देशकों के बारे में आपको बताया था कि उन्होंने कम से कम ईरानी सिनेमा के क्षेत्र में पांच दशक के दौरान, बहुत सी अहम फ़िल्में बनायीं जिनमें ईरानी और विदेशी लेखकों की रचनाओं से साहित्यिक हवाले मौजूद थे। ईरानी सिनेमा साहित्यिक संयोग की प्रक्रिया में उनके प्रभावी योगदान का कोई भी इन्कार नहीं कर सकता। वह ख़ुद भी साहित्यिक हवाले और उसकी सफलता के बारे में कहते हैं, “केवल साहित्यिक संयोग में रूचि या किसी विचार को पेश करना काफ़ी नहीं है बल्कि कहानी की संरचना, व्यक्तित्व का चित्रण और दर्शक को आकर्षित करना बहुत अहम है। विषयवस्तु बहुत है किन्तु कहानी लिखना ख़ास तौर पर साहित्यिक संयोग के साथ स्क्रिप्ट लिखना बहुत महत्वपूर्ण है।” वह कहते हैं, “मुख्य रचना के प्रति वफ़ादारी या उसकी अनदेखी, साहित्यिक संयोग में बहुत महत्व रखती है।  मेरा मानना है कि सिनेमा के कौशल से मुख्य रचना की नई व्याख्या की जानी चाहिए और इस मार्ग में किसी कहानी के मुख्य एवं दार्शनिक अर्थ को स्थानीय रूप दिया जाना चाहिए।” मेहरजूयी की यह बात उनकी बहुत सी फ़िल्मों पर सिद्ध होती है। जैसे ‘गाव’, ‘सारा’, ‘हामून’, ‘परी’  और ‘पोस्टची’ इसकी मिसालें हैं।

 

 

 

दारयूश मेहरजूयी ने फ़िल्म ‘परी’ को 1994 में बनाया था। इस फ़िल्म की स्क्रिप्ट ‘फ़िरनी व ज़ूयी’ नामक किताब पर आधारित है जिसके अमरीकी लेखक जेरोम डेविड सैलिन्जर हैं। यह कहानी उस समय लिखी गयी जब सुदूर पूर्व में आध्यात्मिक शिक्षाएं अमरीकी समाज में सांस्कृतिक बदलाव ले आयी थीं और नए ढंग से सोचने की शैली पेश की। फ़िल्म ‘परी’ एक जवान लड़की और छात्र की ज़िन्दगी पर आधारित है जिनके विचार एक अज्ञात आत्मज्ञानी के आचरण के बारे में किताब पढ़ने के बाद बदल जाते हैं। यह किताब उसकी बड़े भाई की होती है जो आग लगने की एक घटना में मर चुका होता है किन्तु लड़की का दूसरा भाई इस बात की कोशिश करता है कि उन्हें इस परेशानी से मुक्ति दिला दे और उन्हें आध्यात्मिक चरण को तय करने का आसान मार्ग दिखा दे।

 

इस फ़िल्म में मेहरजूयी ने इस्लामी और ईरानी चिन्हों के ज़रिए इस वैश्विक मामले को ईरानी ज़बान में यथासंभव हद तक चित्रित करने की कोशिश की है। इस फ़िल्म में सांस्कृतिक चिन्हों को इस महारत के साथ इस्तेमाल किया है कि बहुत से समीक्षक भी उसे ईरानी सिनेमा में साहित्यिक संयोग के सफल नमूनों में गिनवाते हैं।    

 

 

ईरानी सिनेमा और टेलीविजन के क्षेत्र में साहित्यिक संदर्भ के इस्तेमाल करने वालों में एक और मशहूर नाम क्यूमरस पूर अहमद है। उन्होंने कुछ फ़िल्मों के अलावा क़िस्सहाए मजीद नामक टीवी सीरियल को कहानी के आधार पर बनाया है और उनकी प्रसिद्ध फ़िल्म ख़ाहराने ग़रीब की स्क्रिप्ट भी जर्मन लेखक एरिच कास्टनर कहानी पर आधारित है। यह फ़िल्म और एरिच कास्टनर की किताब इन्सान को बचपन की यादों में ले जाती है। इसकी कहानी दो जुड़वा बहनों के बारे में हैं जो अपने मां-बाप में जुदाई के कारण एक दूसरे से दूर चली जाती हैं और फिर अचानक ग्रीष्म ऋतु के कैंप में एक दूसरे से मिलती हैं तो उन्हें पता चलता है कि वे एक दूसरे की बहन हैं। वे एक दूसरे का स्थान बदलने का फ़ैसला करती हैं और यह क़दम उनके जीवन में बहुत सी घटनाओं के घटने का कारण बनता है।

इस फ़िल्म का सबसे महत्वपूर्ण बिन्दु कहानी के मूल तत्व से वफ़ादारी है।

 

 

अलबत्ता पूर अहमद ने क़िस्सहाए मजीद को फ़िल्म का रूप देते समय इसकी कहानियों में थोड़ा परिवर्तन किया और मुख्य पात्र व माहौल को अपने दृष्टिगत आदर्शों से समन्वित दर्शाया हैं इसी कारण क़िस्सहाए मजीद सीरियल बहुत लोकप्रिय हुआ और यहां तक कि इसकी स्क्रिप्ट लिखने वाला भी बहुत लोकप्रिय हुआ।

ईरानी सिनेमा के एक और निर्देशक बहरूज़ अफ़्ख़मी हैं जिन्हें साहित्यिक संदर्भ में बहुत रूचि है और उनकी बेहतरीन फ़िल्म एक अंग्रेज़ी नाविल की कहानी पर आधारित है। फ़्रेडरिक फ़ॉरसाइथ का नाविल फ़ोर्थ प्रोटोकॉल की कहानी बहुत ही जटिल है। इस उपन्यास की कहानी का संबंध शीत युद्ध के काल में अमरीका और पूर्व सोवियत संघ में घटने वाली घटनाओं से है। इसकी कहानी एक जासूस के क्रियाकलापों पर आधारित है जिसे रूस ब्रिटेन में राजनैतिक संतुलन को ख़राब करने के लिए एक बम धमाका करने का काम सौंपता है। इस उपन्यास में कहानी के नायक को घटनाओं का केन्द्र बिन्दु बनाकर पेश किया गया और इसी कारण पाठक घटनाओं को जानने के लिए पूरी रूचि के साथ उसे पढ़ता है।

 

 

अफ़्ख़मी ने फ़िल्म “रूज़े शैतान” का निर्माण इसी उपन्यास की कहानी को आधार बनाकर निर्माण किया है और उससे बहुत ही सफलता से साहित्यिक संदर्भ लिए हैं। इस फ़िल्म में उपन्यास फ़ोर्थ प्रोटोकॉल की शैली का अनुसरण करते हुए नायक को एक अनजान भौगोलिक क्षेत्र में दिखाया गया है और यही विषय इस फ़िल्म की मज़बूती का भी कारण है और दर्शक को यह समझाने में सफल होती है कि इस प्रकार की घटना के दुनिया के किसी भी क्षेत्र में घटित हो सकती है।

 

कहानी पर आधारित साहित्व के प्रयोग का एक और उदाहरण फ़िल्म “बाज़मान्दे” है जिसके निर्माता सैफ़ुल्लाह दाद हैं। इस फ़िल्म को अस्सान कन्फ़ानी के उपन्यास “बाज़गश्त बे हैफ़ा” की कहानी को मद्दनज़र रख कर बनाया गया है। फ़िलिस्तीनी लेखक कन्फ़ानी का यह बहुत ही मशहूर उपन्यास है। इस उपन्यास की कहानी को आधार बनाकर बहुत सी फ़िल्में बनायी गयी हैं किन्तु सबसे कामयाब फ़िल्म “बाज़्मान्दे” को माना जाता है। सैफ़ुल्लाह दाद का मानना था कि उन्होंने फ़िल्म की थीम कन्फ़ानी के उपन्यास से ली थी लेकिन लेखक ने जो निराशा और रक्षात्मक दृष्टिकोण  उपन्यास में अपनाया था उसे उन्होंने नहीं लिया बल्कि उसमें फ़िलिस्तीनी जनता के इन्तेफ़ाज़ा आंदोलन की ओर बढ़ने और इसके आशावादी नतीजे को शामिल कर दिया है। इसी प्रकार इस फ़िल्म में वतन परस्ती और शहादत के विषय को बहुत ही अच्छे ढंग से पेश किया है जिसने उपन्यास की मूल कहानी और इस फ़िल्म के बीच अंतर को स्पष्ट कर दिया है।  

 

          

ईरान में युवा फ़िल्म निर्माताओं में भी ऐसे निर्माता हैं जिन्हें साहित्यिक संदर्भ के इस्तेमाल में रूचि है और हालिया वर्षों में इस प्रकार की फ़िल्में भी बनायी गयी हैं। बहराम तवक्कुली की फ़िल्म “ईन्जा बेदूने मन” टेनेसी विलियम्ज़ के नाटक “द ग्लास मनाजरी” पर आधारित है जो साहित्यिक संदर्भ का बहुत ही अच्छा उदाहरण है।

अंत में साहित्यिक संदर्भ के संबंध में यह कहना ग़लत न होगा कि जो कुछ अब तक ईरानी सिनेमा में घटा है वह ईरानी और वैश्विक साहित्य की  प्रसिद्ध रचनाओं से लिया गया सफल अनुभव रहा है।

 

 

ईरानी लेखक व अनुवादक मोहम्मद मंसूर हाशेमी का मानना है कि इन फ़िल्मों के बावजूद ईरान के कथात्मक साहित्य में ऐसी रचनाएं हैं कि अगर उन्हें मद्देनज़र रख कर फ़िल्म बनायी जाए तो संदर्भ की मुश्किल सामने  आएगी। वह उम्मीद करते हैं कि भविष्य में ईरान के प्रसिद्ध लेखकों के पवित्र प्रतिरक्षा के संबंध में उत्कृष्ट रचनाओं या ईरानी लेखिकाओं की प्रसिद्ध रचनाओं पर फ़िल्म बनेगी और ईरानी सिनेमा इस समृद्ध साहित्य से लाभान्वित होगा।

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