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मंगलवार, 01 अप्रैल 2014 00:00

सिनेमा और साहित्य के रिश्ते

सिनेमा और साहित्य के रिश्ते

जैसा कि आप जानते हैं सिनेमा की उम्र साहित्य और दूसरी कलाओं से कम है, लेकिन इसके बावजूद यह नई कला दूसरों से आगे निकल गई और दर्शकों पर इसका प्रभाव अधिक होता है। हालांकि दूसरी कलाओं ने भी सिनेमा की सहायता की है और उसे अधिक प्रभावशाली बनाने में अहम भूमिका निभाई है।

सिनेमा के जन्म की शुरूआत से ही साहित्य का इस कला में विशेष स्थान रहा है और सफ़ल साहित्य ने फ़िल्म की सफ़लता में अपनी भूमिका निभाई है। हालांकि साहित्य फ़िल्म में विविधता और सुन्दरता लाता है लेकिन अक्सर ऐसा होता है कि फ़िल्म देखने के बाद बहुत से लोग यह कहते हुए देखे जा सकते हैं कि जिस पुस्तक पर आधारित यह फ़िल्म बनी है उससे कहीं अधिक आकर्षक तो वही पुस्तक थी। इसलिए यह कहा जा सकता है कि सिनेमा कदापि साहित्य की बारीकियों तक नहीं पहुंच सकता, बल्कि शब्दों में ही वह शक्ति होती है जो पाठक की भावनाओं, विचारों और कल्पनाओं में उफान ला सकते हैं। इस वास्तविकता को भी स्वीकार करना चाहिए कि सिनेमा आधुनिक टैक्नॉलौजी द्वारा दर्शकों के सामने ऐसी तस्वीरें पेश कर सकता है कि जो शब्दों की पहुंच से बाहर हैं। सिनेमा की बहुत सी ख़ूबियां और विशेषताएं उसे दूसरी कलाओं पर वरीयता प्रदान करती हैं।

 

 

बहरहाल, सिनेमा का साहित्य से अटूट रिश्ता रहा है। लगभग दुनिया भर में सबसे लोकप्रिय फ़िल्मों में से आधी फ़िल्में साहित्य के आधार पर ही लोकप्रिय हुई हैं। इसी प्रकार हम ऐसे लेखकों का नाम ले सकते हैं कि जिन्होंने दुनिया भर में प्रसिद्ध होने के साथ साथ फ़िल्म निर्माताओं का ध्यान अपनी ओर खींचा है। जैसे कि विलियम शेक्सपीयर, फ्योदोर दोस्तोयेव्स्की, लियो टॉलिस्टॉय, एरिच कास्नेर (Erich Kästner), चार्ल्ज़ डिकेंस और एलेक्ज़ैंडर डूमाज़ का नाम लिया जा सकता है। इसके अलावा एंटन चेख़ोव, मूलीर, हेनरिक एबसन, टेनेसी विलियमज़ और अनेक दूसरे स्क्रिप्ट राइटरों के नाम लिए जा सकते हैं, जिन्होंने प्रसिद्ध और लोकप्रिय फ़िल्में दीं।

प्राप्त आंकड़ों की समीक्षा से पता चलता है कि कभी कभी एक ही साहित्य पर अलग अलग कालों में बनने वाली फ़िल्मों में एक ही कहानी को विविध रूप से पेश किया गया होता है। उदाहरण स्वरूप, विलियम शेक्सपीयर के ड्रामे किंग लीयर के आधार पर दुनिया भर में विभिन्न फ़िल्में बनाई गईं और वे सभी एक दूसरे से भिन्न थीं। उनमें से हर एक इस कहानी पर एक विशेष आयाम से दृष्टि डालती है और एक नई दास्तान बयान करती है।

शुरू से ही ईरानी सिनेमा में भी साहित्य पर विशेष ध्यान दिया गया और ईरानी सिनेमा और साहित्य में मज़बूत बंधन बन गया। हालांकि इस संबंध में उतार चढ़ाव आते रहे लेकिन ऐसे बेहतरीन उदाहरण मौजूद हैं जिनसे पता चलता है कि बेहतरीन साहित्यों का चयन किया गया है और प्रतिभाशाली फ़िल्मकारों ने अच्छी तरह अपनी योग्यता का प्रयोग किया है।

 

 

ईरान की पहली बोलती फ़िल्म के निर्देशक अब्दुल हुसैन सपन्ता पहले ऐसे निर्देशक हैं जिन्होंने साहित्य को महत्व दिया और 1935 में शीरीन व फ़रहाद नामक फ़िल्म बनाई। इस फ़िल्म की कहानी में फ़रहाद नामक एक व्यक्ति शीरीन नामक एक राजकुमारी से प्यार करने लगता है और उसे हासिल करने के लिए बहुत ही कठिनाईयां सहन करता है। यह कहानी ईरानी कवि निज़ामी गंजवी की कविता पर आधारित है जो फ़ार्सी साहित्य में प्रसिद्ध है। सपंता ने निर्देशक के अलावा इस फ़िल्म में फ़रहाद की भूमिका भी निभाई है।

सपंता ने इस फ़िल्म के सफ़लतापूर्वक प्रदर्शन के दो साल बाद, निज़ामी की दूसरी कविता पर आधारित लैला व मजनू फ़िल्म बनाई। इस फ़िल्म में भी लैला मजनू के इश्क़ की कहानी बयान की गई। इस तरह बहुत ही भावनात्मक एवं बड़े बजट वाली फ़िल्म बनी।

इसके बाद, धीरे धीरे ईरानी निर्देशकों का रुझान साहित्य और कथाओं की ओर हो गया। इस बीच, बहुत कम फ़िल्में दुनिया के प्रसिद्ध साहित्यों के आधार पर बनाई गईं। कुल मिलाकर, 1930 से 2010 तक तीन हज़ार से अधिक फ़िल्में बनीं जिनमें से लगभग डेढ़ प्रतिशत फ़िल्में ग़ैर ईरानी साहित्यों पर आधारित थीं। इससे पता चलता है कि ईरान में ग़ैर ईरानी साहित्यों पर आधारित फ़िल्मों का रिवाज नया है।

ईरान में इस्लामी क्रांति की सफ़लता से पहले दुनिया के प्रसिद्ध लेखकों और साहित्यकारों की कहानियों का ईरानी फ़िल्मकार स्वागत करते थे।

 

 

1979 में ईरान में इस्लामी क्रांति की सफ़लता के बाद, निर्देशकों की नई नस्ल ने फ़िल्म उद्योग में क़दम रखा और साहित्य के प्रति दृष्टिकोणों में कुछ बदलाव आया। उन्होंने पहली दृष्टि में अत्याचारों और ज़ुल्म को वरीयता दी और पतित होने वाले शाह के शासन का वास्तविक चेहरा पेश किया। इस प्रकार, शुरूआतीं फ़िल्मे इस विषय पर बनाई गईं तथा फ़िल्म निर्माताओं ने आलोचनात्क साहित्य का चयन किया। जॉन अश्ताइन बिक और एंटून्यूस सामाराकीस पहली ऐसी कहानियां हैं जिनके आधार पर तूफ़ानी लहरें और कमज़ोर बिंदु नामक फ़िल्में बनाई गईं, जिन्होंने पूर्व अत्याचारी शासन के अत्याचारों का उल्लेख किया।

ईरान के आलोचक डा. हुसैन पायंदे का कहना है कि साहित्य पर आधारित कहानी उस समय सफ़ल है कि जब फ़िल्म लेख को पर्दे पर उतारने में सफल रहे और वास्तव में वह उसका तस्वीरी अनुवाद हो। उनके इस कथन का एक उदाहरण नाख़ुदा ख़ुर्शीद फ़िल्म है जो नासिर तक़वायी ने बनाई है। इस फ़िल्म का आधार अर्निस्ट हेमिंग्वे का उपन्यास टू हैव एंड हैव नॉट है। तक़वायी ने इस कहानी का इस प्रकार से देसीकरण किया है कि 28 वर्ष बीत जाने के बाद भी उनकी फ़िल्म की मिसाल दी जाती है।

 

 

टू हैव एंड हैव नॉट एक व्यक्ति की कहानी है कि जो एक नाव द्वारा फ़्लोरिडा और हवाना के बीच तस्करी करता है। वह अपनी नाव को अमरीकी धनपतियों के मनोरंजन के लिए भी किराए पर देता है और उन्हें मछली पकड़वाने के लिए समुद्र में ले जाता है। एक दिन उनमें से एक उसे किराया अदा किए बग़ैर चलता बनता है। वह व्यक्ति वापसी का ख़र्च प्राप्त करने के लिए एक समूह को अमरीकी तटों पर ले जाने का झूठा वादा देता है और आवश्यक राशि हासिल कर लेता है। उसके बाद कस्टम अधिकारियों के साथ झड़प में उसका हाथ कट जाता है और अंततः यात्रियों के बीच लड़ाई झगड़ें में वह मारा जाता है।

दक्षिणी ईरान की भौगोलिक स्थिति और लोगों के बारे में तक़वायी की व्यापक जानकारी के कारण नाख़ुदा ख़ुर्शीद फ़िल्म का दर्शकों ने बड़े पैमाने पर स्वागत किया।

 

 

इस फ़िल्म में कहानी की मूलतः को पूरी तरह सुरक्षित रखा गया है और बहुत ही होशियारी एवं दक्षता से कहानी को दक्षिणी ईरान के लोगों के जीवन के रूप में उतारा गया है। ऐसे बहुत से लोगों का कहना है कि जिन्होंने इस फ़िल्म को देखा है और हेमिंग्वे की कहानी को पढ़ा है कि फ़िल्म का मूलतः वातावरण हेमिंग्वे की कहानी से बहुत निकट है और जो एहसास किताब को पढ़ते समय होता है वही एहसास फ़िल्म को देखते समय भी होता है।                       

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