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बुधवार, 25 मार्च 2015 00:00

सिनेमा में अर्थव्यवस्था की भूमिका

सिनेमा में अर्थव्यवस्था की भूमिका

जब कभी कला विशेषकर सिनेमा के बारे में बात की जाती है तो हो सकता है कुछ लोग यह कहें कि सिनेमा का अर्थव्यवस्था से कोई लेना देना नहीं है।  हालांकि जब हम सिनेमा की गहन समीक्षा करते हैं तो पाते हैं कि आरंभ से लेकर अंत तक इसका धन से संबन्ध है। 

 

कला के जितने भी वर्तमान रूप हैं उनमें सिनेमा को अति विशेष महत्व प्राप्त है।  किसी भी देश में बनने वाली फिल्में वहां के सामाजिक जीवन और रीति-रिवाज का दर्पण हुआ करती हैं।  सिनेमा का बहुत बड़ा प्रभाव, देशों की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है।  हालांकि सांस्कृतिक और राजनैतिक क्षेत्र में भी सिनेमा की भूमिका को अनेदखा नहीं किया जा सकता किंतु आर्थिक क्षेत्र में इसके प्रभाव को बहुत महत्वपूर्ण बताया जाता है।  सिनेमा वास्तव में सिनेमाघरों, दर्शकों, निर्माताओं, कलाकारों और उससे होने वाली आय का एक समूह है किंतु वर्तमान समय में इसकी आय को विशेष महत्व प्राप्त है।  विभिन्न देशों की सरकारें, सिनेमा से होने वाली आय को विशेष महत्व देती हैं।  विश्व के कुछ देशों में विशेषकर संसार की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के स्वामी देशों के सकल घरेलू उत्पाद में फ़िल्म उद्योग की उल्लेखनीय भूमिका है।

 

 

उदाहरण स्वरूप भारत का बालीवुड सिनेमा, फ़िल्मों के उत्पादन में विश्व के देशों में सबसे आगे है।  भारत में प्रतिवर्ष 900 से अधिक फ़िल्में बनती हैं।  बालीवुड की फ़िल्मों को विश्व में बहुत लोकप्रियता प्राप्त है।  क्षेत्रीय देशों में इसके बहुत से दर्शक पाए जाते हैं।  भारत ने सिनेमा उद्योग में विदेशी पूंजी निवेश के लिए विशेष क़दम उठाए हैं।  भारत में सिनेमा की आय, अधिकांश दर्शकों से ही होती है।  भारत में बालीवुड की फ़िल्मों के प्रति विशेष लगाव पाया जाता है।  एक प्रकार से यह कहा जा सकता है कि भारत में क्रिकेट के बाद, बालीवुड की फ़िल्में ही मनोरंजव का सबसे बड़ा साधन हैं।

 

यदि आय की दृष्टि से देखा जाए तो विश्व में हालीवुड को सबसे बड़ा स्थान प्राप्त है।  सन 2012 में हालीवुड की फ़िल्मों ने 10 अरब 807 मिलयन डालर कमाए थे।  वर्ष 2011 की तुलना में हालीवुड को फ़िल्मों की आय में 6 दश्मलव 5 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी।  फ़िल्मों के निर्माण की दृष्टि से भारती सिनेमा का स्थान, हालीवुड से ऊपर है क्योंकि हालीवुड में प्रतिवर्ष लगभग 700 फ़िल्में बनती हैं जबकि भारत में इनकी संख्या 900 से अधिक है।  इस प्रकार फ़िल्मों के उत्पाद या निर्माण की दृष्टि से हालीवुड, विश्व के दूसरे स्थान पर है जबकि आय की दृष्टि से पहले स्थान पर।  हालिवुड के आर्थिक मामलो के एक जानकार एडवर्ड जी स्टाइन का कहना है कि वास्तव में हालिवुड, पैसे बनाने की एक मशीन है।

 

 

विश्व के जिन 30 देशों में फ़िल्में बनाई जाती हैं उनमें एक ईरान भी है।  ईरान में प्रतिवर्ष 70 से 100 फ़िल्में बनाई जाती हैं।  इस प्रकार से ईरान, फ़िल्म निर्माण करने वाले देशों के बीच 5 से 15वें स्थान के बीच है।  वर्तमान समय में ईरान में लगभग 300 सिनेमा हाल हैं।  इन सिनेमा हालों में स्वदेशी फ़िल्में ही दिखाई जाती हैं और यहां पर विदेशी फ़िल्में लगभग न के बराबर ही प्रदर्शित होती हैं।

 

ईरान में इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद सरकार ने फ़िल्म उद्योग को प्रोसाहित करने के लिए उसकी आर्थिक सहायता की।  यह कार्य “फ़ाराबी फ़ाउन्डेशन” के माध्यम से किय गया।  “फ़ाराबी फ़ाउन्डेशन” एक ग़ैर सरकारी संगठन है जो इस्लामी सांस्कृतिक मंत्रालय के अधीन गतिविधियां अंजाम देता है।  वास्तव में यह संगठन, सांस्कृतिक गतिविधियों में इस मंत्रालय के सहायक के रूप में कार्य करता है।

 

 

“फ़ाराबी फ़ाउन्डेशन” ईरान के भीतर और बाहर फ़िल्में बनाने और उनके वितरण के अतिरिक्त फ़िल्मों के निर्माण के लिए पूंजी निवेश भी करता है।  ईरान में प्रतिवर्ष बनने वाली फ़िल्मों में लगभग 30 प्रतिशत फ़िल्में इसी संगठन के माध्यम से बनती हैं।  सर्वेक्षणों से ज्ञात होता है कि पिछले तीन दशकों के दौरान ईरान में फ़िल्म निर्माण उद्योग ने उल्लेखनीय विकास किया है। देश में बनने वाली फ़िल्में, डाक्यूमेंट्री फ़िल्में, लघु फ़िल्में और एनीमेशन आदि समस्त फ़िल्मों पर जो संस्था नज़र रखती है वह देश के सांस्कृतिक मंत्रालय से संबन्धित है।  यह संस्था इसी प्रकार से युवा निर्माताओं को प्रोत्साहित भी करती है ताकि वे अच्छी से अच्छी फ़िल्मों का निर्माण कर सकें।

 

इसके अतिरिक्त “ईरानी युवा सिनेमा” के नाम की एक अन्य संस्था भी है जो देश के भीतर फ़िल्मों के निर्माण के क्षेत्र में कार्य करती है।  यह संस्था युवा निर्माताओं को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से उनके लिए आर्थिक संभावनाएं उपलब्ध कराती है।  सन 1974 में इस संस्था की नींव रखी गई थी।  अपने गठन के आरंभ से ही इसने प्रशिक्षण के लिए क्लास रखने आरंभ कर दिये थे।  इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद ईरानी युवाओं को फोटोग्राफ़ी और फ़िल्म निर्माण के लिए प्रेरित करने के उद्देश्य से देश में 50 केन्द्रों की स्थापना की गई।  इन केन्द्रों या फ़िल्म इंस्टीट्यूट्स में फ़िल्म निर्माण से संबन्धित सारे विषयों की शिक्षा दी जाती है।  इन केन्द्रों के प्रयासों का परिणाम प्रतिवर्ष 2000 से अधिक लघुफ़िल्मों का निर्माण और अन्तर्राष्ट्रीय घटनाओं पर बनी फ़िल्मों को प्राप्त 100 पुरस्कार हैं।  सरकार की ओर से फ़िल्म निर्माण के क्षेत्र में किये जाने वाले प्रयासों के अतिरिक्त निजी क्षेत्र ने भी फ़िल्मों के निर्माण में विशेष भूमिका निभाई है।

 

 

 

वर्तमान समय में ईरान में इस प्रकार के लगभग 30 केन्द्र अपनी गतिविधियां कर रहे हैं।  केन्द्रों की यह संख्या स्थिर नहीं रही और वर्तमान समय में बढ़कर 60 हो गई है।  ईरान के एक निर्माता का नाम अली सरतीपी है।  फ़िल्मों के निर्माण के क्षेत्र में वे लंबे समय से कार्य कर रहे हैं।  उनकी कंपनी ने पिछले कुछ वर्षों के दौरान चर्चित और सफल फ़िल्में बनाई हैं।  अली सरतीपी का मानना है कि ईरान में फ़िल्म सिनेमा की प्रगति और उसके विकास की प्रक्रिया में निजी क्षेत्रों की उल्लेखनीय भूमिका रही है।  वे कहते हैं कि उनकी सफलता में दक्ष लोगों की सेवाएं लेने और उनके प्रचार-प्रसार के लिए आधुनिक शैली का प्रयोग करना आदि सम्मिलित है।

 

ईरान में एक अन्य फ़िल्म निर्माता हैं मुर्तज़ा शाइस्ते।  वे बहुत अनुभवी निर्माता हैं।  मुर्तज़ा शाइस्ते का मानना है कि दर्शकों की संख्या को बढ़ाने में किसी निर्माता के अनुभव और उसकी शैली का प्रयोग बहुत महत्वपूर्ण होता है।  वे कहते हैं कि अपने दृष्टिकोण और शैली में परिवर्तन करके 80 से 100 मिलयन दर्शकों की संख्या को 200 मिलयन तक पहुंचाया गया है।

 

 

संस्कृति और सिनेमा के क्षेत्र में नई एवं आधुनिक शैलियों को अपनाकर फ़िल्म के निर्माण और उसके दर्शकों की संख्या में तेज़ी से वृद्धि की जा सकती है।  ईरान के एक अन्य विख्यात निर्माता मुहम्मद मेहदी दादगू ने इस क्षेत्र में वर्षों कार्य किया है और उन्हें इस क्षेत्र में बहुत अनुभव प्राप्त है।  फ़िल्म निर्माण के बारे में वे कहते हैं कि वास्तविकता यह है कि देश के भीतर राष्ट्रीय सिनेमा निर्माण को अधिक प्रोत्साहित किया जाए।  वे कहते हैं कि इसमें सिनेमा के आर्थिक आयाम को अवश्य दृष्टिगत रखा जाए।  मेहदी दादगू कहते हैं कि सिनेमा का सांस्कृतिक रूप सदैव ही विशेष महत्व रखता है जो उसका मूल रूप है।  वे कहते हैं कि इस बारे में फ़िल्म निर्माण के क्षेत्र के अनुभवी निर्माताओं के अनुभव से अवश्य लाभ उठाया जाए।  उनका कहना है कि हम सांस्कृतिक गतिविधिया करते हैं इसलिए हमारी फ़िल्मों का समाज निर्माण में बड़ा हाथ है।  मेहदी दादगू कहते हैं कि फ़िल्म निर्माण के क्षेत्र में हमें संस्कृति की दृष्टि से अधिक से अधिक सतर्क रहना चाहिए ताकि फ़िल्में अधिक से अधिक सकारात्मक प्रभाव डाल सकें।          

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