यह वेबसाइट बंद हो गई है। हमारी नई वेबसाइट हैः Parstoday Hindi
सोमवार, 16 मार्च 2015 16:56

मोहसिन मख़मलबाफ़

मोहसिन मख़मलबाफ़

हमने आपको कुछ एसे फ़िल्म निर्माताओं के बारे में बताया था जिन्होंने ख्याति प्राप्त करने और अन्तर्राष्ट्रीय फिल्म फैस्टिवलों में अपनी फ़िल्मों को प्रस्तुत करने के लिए उसके आयोजकों की रूचि के अनुसार फ़िल्मों का निर्माण किया।

 

इन लोगों में से एक “मोहसिन मख़मलबाफ़” थे।  उनका जन्म सन 1975 में तेहरान के एक निर्धन पवित्र में हुआ था।  परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के कारण मख़मलबाफ़ ने बचपन से ही काम करना आरंभ कर दिया था।  जब वे जवान हुए तो उन्होंने पहलवी शासन व्यवस्था के विरुद्ध राजनैतिक गतिविधियां आरंभ कर दीं।  शाह के विरुद्ध राजनैतिक गतिविधियों के कारण मोहसिन मख़मलबाफ़ को गिरफ़्तार करके जेल में डाल दिया गया।

 

ईरान में इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद मख़मलबाफ़, जेल से स्वतंत्र हुए।  अपनी स्वतंत्रता के बाद उन्होंने कहानियां लिखने और फ़िल्म बनाने का कार्य आरंभ किया।  हालांकि इस क्षेत्र में उन्हें कोई अनुभव नहीं था फिर भी वे निर्माताओं पर मौखिक आक्रमण किया करते थे।  उनके बारे में मशहूर है कि वे बहुत ही तीखे स्वभाव के थे।  कभी-कभी वे एसे दावे किया करते थे जिन्हें सुनकर लोगों को आश्चर्य होता था।  अपने एक साक्षात्कार में मख़मलबाफ़ ने कहा था कि वे अपने शरीर पर बम बांधकर उस ईरानी फ़िल्म निर्माता की हत्या कर देंगे जिसने व्यंगात्मक फ़िल्म बनाई थी।

 

मख़मलबाफ़, आरंभ से तीखे स्वभाव के थे।  यही कारण है कि उनकी अधिकांश फ़िल्मों में घटनाओं पर भावनात्मक प्रतिक्रियाएं व्यक्त की जाती थीं।  यही कारण है कि उनकी फ़िल्मों पर समाज में तीव्र प्रतिक्रियाएं की गईं।  आरंभ से ही बहुत से लोग उनके भीतर पाई जाने वाली अति के बारे में सचेत किया करते थे।  उनके एक आलोचक का कहना है कि मैं इस फ़िल्म निर्माता के भविष्य के प्रति बहुत चिंतित हूं।  वे कहते हैं कि सिनेमा एक आग की भांति है जिससे मख़मलबाफ़ खेल रहे हैं।  यह बहुत ख़तरनाक है।  इसका कारण यह है कि इस आग से केवल घर या घर की वस्तुएं नहीं जलेंगी बल्कि सबकुछ जलकर राख हो जाएगा।

 

दूसरी ओर इस प्रकार की प्रतिक्रियाओं के साथ ही मख़मलबाफ़ की फ़िल्मों ने अन्तर्राष्ट्रीय फ़िल्म समारोहों में भाग लेना आरंभ कर दिया और उनकी प्रशंसा में भी बहुत कुछ कहा जाने लगा।  साथ ही उनकी फ़िल्मों को पुरस्कृत भी किया गया।

 

ईरान की इस्लामी क्रांति के आरंभिक कुछ वर्षों में “मोहसिन मख़मलबाफ़” को एक क्रांतिकारी और धार्मिक फ़िल्म निर्माता के रूप में देखा जाता था किंतु उनकी फ़िल्में और उनकी बातें, अतिवाद के प्रतीक के रूप में परिवर्तित होने लगीं।  एक समय में तो वे हरएक को क्रांति के मानदंडों पर तौला करते थे किंतु धीरे-धीरे वे इतने परिवर्तित हो गए कि पश्चिम को उन्होंने मानदंड बनाया।  बाद में मख़मलबाफ़ ने एसी फ़िल्में बनाईं जो उनके द्वारा बनाई जाने वाली पहले की फ़िल्मों से बहुत भिन्न थीं बल्कि पूर्ण रूप से उनमें विरोधाभास पाया जाता था।

कुछ समय पहले “मोहसिन मख़मलबाफ़” ने अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय में स्वयं को प्रस्तुत करने के उद्देश्य से बैतुल मुक़द्दस में फ़िल्म बनाई।  उनकी इस फ़िल्म को फ़िल्म फेस्टिवल में ज़ायोनियों की ओर से पुरस्कार दिया गया।  यह कार्य न केवल ईरान के भीतर तीव्र प्रतिक्रियाओं का कारण बना बल्कि विश्व स्तर पर भी उनकी आलोचना की जाने लगी।  बहुत से बुद्धिजीवियों और कलाकारों ने उनके इस कार्य की आलोचना की।

 

 

हालांकि वास्तविकता यह है कि इन बातों का मख़मलबाफ़ पर कोई प्रभाव नहीं हुआ क्योंकि उनका मुख्य उद्देश्य विश्वमंच पर स्वयं को प्रस्तुत करना और फ़िल्म फेस्टिवल में कुछ लोगों की प्रशंसा हासिल करना था।  यहा पर इस बात का उल्लेख भी आवश्यक है कि “मोहसिन मख़मलबाफ़” का कहना है कि ईरान के भीतर अपनी आलोचना के कारण उन्होंने वहां से पलायन किया है।  हालांकि ईरान से जाने से पहले मख़मलबाफ़ ने हर प्रकार की संभावना का प्रयोग करते हुए स्वेच्छा से हर प्रकार की फ़िल्मों का निर्माण किया।  उन्होंने देश में रहते हुए हर प्रकार की आलोचनाएं भी कीं।  पश्चिमी मंच से उनकी जो बातें प्रस्तुत की जा रही हैं उनसे एसा लगता है कि शायद किसी को मख़मलबाफ़ के अतीत की जानकारी नहीं है।

 

अब हम आपको एक अन्य निर्माता के बारे में बताने जा रहे हैं जो अन्तर्राष्ट्रीय फ़िल्म समारोहों की चमक-दमक का शिकार होकर मुख्य मार्ग से हट गए।  इस निर्माता का नाम है “बहमन क़ोबादी”।  “बहमन क़ोबादी” का जन्म पश्चिमी ईरान में सन 1969 में हुआ था।  उन्होंने सिनेमा के क्षेत्र में अध्ययन आरंभ किया किंतु उसे बीच में ही छोड़कर वे लघु फ़िल्में बनाने लगे।

 

“बहमन क़ोबादी” जो लघु फिल्में बनाते थे उन्होंने धीरे-धीरे लोकप्रियता प्राप्त करना आरंभ की।  उनकी फ़िल्में देश के भीतर और विदेश में होने वाले फ़िल्मी मेलों में भाग लेने लगीं।  उन्होंने कुछ पुरस्कार भी अर्जित किये।  इसके बाद “बहमन क़ोबादी” ने फीचर फिल्में बनानी आरंभ कीं।  अब वे धीरे-धीरे पेशेवर फ़िल्म निर्माताओं की पंक्ति की ओर बढ़ने लगे।  “बहमन क़ोबादी” की अधिक्तर फ़िल्मों की शूटिंग ईरान के कुर्दिस्तान में हुई है।  वे सामान्यतः सामाजिक और एतिहासिक विषयों पर फ़िल्में बनाते थे।  इसी बीच उन्होंने राजनीति के बारे में प्रखर रूप में प्रतिक्रियाएं देना आरंभ कर दीं जिसके बाद से उन्हें अन्तर्राष्ट्रीय फ़िल्म फेस्टिवलों में एक राजनैतिक आलोचक के रूप में प्रस्तुत किया जाने लगा।  उनकी फ़िल्मों में जातीय मतभेदों को अधिक उठाया जाता था।  उनकी फ़िल्मों का पश्चिम ने राजनैतिक दुरूपयोग करना आरंभ किया जिसके कारण उन्हें एक दक्ष राजनैतिक आलोचक के रूप में प्रस्तुत किया जाने लगा।

 

बहमन क़ोबादी ने अपनी अन्तिम फ़िल्म “फ़स्ले करगदन” में एतिहासिक वास्तविकताओं को परिवर्तित करते हुए पश्चिमी प्रशंसकों की प्रसन्नता के उद्देश्य से देश और राष्ट्र के विरुद्ध बातें कहीं हैं।  उनकी इस फ़िल्म में बहुत अधिक झूठ और नैतिकता से परे की बातें हैं।

हालांकि बहमन क़ोबादी का दावा है कि वे राजनीतिक सूझबूझ रखने वाले एक कुशल निर्माता हैं जबकि उनकी फ़िल्मों से पता चलता है कि वास्तव में वे स्वयं राजनेताओं की कठपुतली बने हैं।  उल्लेखनीय है कि बहमन क़ोबादी लंबे समय से स्वयं को ईरानी सिनेमा निर्देशक नहीं मानते।  उनकी इच्छा है कि उनकी फ़िल्मों को कुर्दी सिनेमा कहा जाए।  जानकारों का कहना है कि एसा होना संभव नहीं है क्योंकि अबतक ईरान के किसी भी फ़िलम निर्माता ने स्वयं को ईरानी राष्ट्र से अलग नहीं बताया है चाहे उसका धर्म और उसकी जाति जो कुछ भी रही हो।

बहमन क़ोबादी के इस कार्य पर ईरानी सिनेमा के प्रशंसकों ने नकारात्मक प्रतिक्रियाएं व्यक्त की हैं।  उनको अब ईरान के शत्रुओं की कठपुतली के रूप में देखा जाता है।

 

 

“फ़स्ले करगदन” में ईरान के विरुद्ध अमरीकी आरोपों को सही सिद्ध करने के प्रयास किये गए हैं।  यह वही चीज़ है जिसे अमरीकी चाहते हैं।  संभवतः यही कारण है कि बहमद क़ोबादी की फ़िल्म “फ़स्ले करगदन” के निर्माण के लिए एक अमरीकी कंपनी ने धन उपलब्ध कराया था।

प्रिय श्रोताओ, अबतक आपने जो कुछ ईरानी फ़िल्म निर्माताओं के बारे में सुना वह एसी चुनौती है जिसका सामना ईरान के आधुनिक सिनेमा को इस्लामी क्रांति के बाद के वर्षो में रहा है।  ईरान की इस्लामी क्रांति के बाद नवीन सिनेमा में होने वाली प्रगति पश्चिमी हलक़ों को इतनी अखर रही है कि उसे रोकने या समाप्त करने के लिए वे सबकुछ करने को तैयार हैं।  इस्लामी क्रांति के बाद उगने वाला यह पौधा अब शक्तिशाली वृक्ष बन चुका है जिसने समाज को नैतिक और शिक्षाप्रद फ़िल्में दी हैं।  ईरानी सिनेमा बहुत से उतार-चढ़ाव से गुज़रने के बाद अब बहुत सशक्त हो गया है और उसे पश्चिमी षडयंत्रों से कोई क्षति होने वाली नहीं है।    

      फेसबुक पर हमें लाइक करें, क्लिक करें 

 

Media

Add comment


Security code
Refresh