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बुधवार, 04 मार्च 2015 16:56

बच्चों और नौजवानों पर केन्द्रित फ़िल्में

बच्चों और नौजवानों पर केन्द्रित फ़िल्में

इन फ़िल्मों को विदेश में बहुत सराहा गया। आपको याद होगा कि पिछले कार्यक्रम में हमने इस बात का उल्लेख किया था कि ईरान में बाल फ़िल्म का इतिहास 1966 से शुरु होता है। इस साल बाल व किशोर वैचारिक ट्रेनिंग केन्द्र ने पहली बार एक अंतर्राष्ट्रीय बाल व किशोर फ़ेस्टिवल का आयोजन करके बाल सिनेमा पर ख़ास ध्यान दिया। इस केन्द्र में बाल सिनेमा ने आत्म-निर्भर पहचान के रूप में ताज़ा क़दम बढ़ाया और उन फ़िल्म निर्माताओं ने जो बाल फ़िल्म में रूचि रखते थे, आरंभिक नमूने बनाए। किन्तु उस समय के बाल सिनेमा को विदेश में नहीं सराहा गया कि इसका कारण उस समय के बाल व किशोर वैचारिक ट्रेनिंग केन्द्र का माहौल था।

 

 

उस समय यथार्थवाद और विश्वस्नीयता की नई व्याख्या पेश की गयी और उन लोगों ने इस सिनेमा जगत में क़दम रखा जो वृद्धावस्था की दुनिया की कड़ुवाहट से ऊब चुके थे। उस समय का बाल सिनेमा ऐसे फ़िल्मकारों के हाथों में था जो बड़ों और समीक्षकों को मद्देनज़र रख कर फ़िल्म बनाते थे। इन फ़िल्मों को देखने से स्पष्ट हो जाता है कि सिर्फ़ एक बच्चा और एक किशोर फ़िल्म में अभिनय करता दिखाई देता है कि ये फ़िल्म किसी भी हालत में इस आयु वर्ग के लिए उचित नहीं है।

मसऊद मेहराबी “ईरानी सिनेमा का इतिहास” नामक किताब में इस संदर्भ में लिखते हैं, “ पिछले अर्थात क्रान्ति से पहले के शासन की सांस्कृतिक नीति बाल व किशोर वैचारिक ट्रेनिंग केन्द्र द्वारा ऐसी फ़िल्मों का निर्माण था जिसे फ़ेस्टिवल में पेश किया जा सके और इस केन्द्र की स्थापना का एक मक़सद असंतुष्ट प्रबुद्ध वर्ग को ग़ैर राजनैतिक कला में व्यस्त रखना था।”

अलबत्ता मसऊद मेहराबी इस बात को भी मानते हैं कि बाल व किशोर वैचारिक ट्रेनिंग केन्द्र ने मूल्यवान कार्य किए हैं मगर अस्ल बहस का विषय इस केन्द्र में बच्चों और किशोरों के लिए बनने वाली फ़िल्म हैं जो देश से बाहर ईरान का प्रतिनिधित्व करती है।

 

 

मसऊद मेहराबी कहते हैं, “बाल व किशोर वैचारिक ट्रेनिंग केन्द्र की फ़िल्मों का वैचारिक आधार उन लोगों के विचार थे जो बाल साहित्य के क्षेत्र में काम करते थे। इस केन्द्र की कुछ फ़िल्मों का बौद्धिक स्तर इतना ऊंचा था कि न सिर्फ़ बच्चे बल्कि बड़े भी उसे नहीं समझ सकते थे। ये फ़िल्म निर्माता देश के भीतरी दर्शकों को प्रसन्न करना अपना दायित्व नहीं समझते थे, बल्कि यह विचार आम था कि फ़िल्में ऐसी बनें जिससे फ़ेस्टिवल के दर्शक व माहिर प्रभावित हों।” इस विचार के साथ बाल व किशोर वैचारिक ट्रेनिंग केन्द्र में लघु व फ़ीचर फ़िल्म बनाकर फ़िल्म फ़ेस्टिवल में भेजी गयीं। अब्बास किया रुस्तमी, अमीर नादेरी, नासिर तक़वायी, नूरुद्दीन ज़र्रीन किल्क और अली अकबर सादेक़ी उन फ़िल्म निर्माताओं में हैं जिन्हों ने इस केन्द्र के लिए फ़िल्में बनायीं और उनकी फ़िल्में फ़िल्म समीक्षकों की नज़रों से गुज़रीं और विदेश में भी भेजी गयीं।

 

 

लेकिन अगर इन फ़िल्म फ़ेस्टिवलों के ज़्यादातर मानदंडों को देखें तो इनमें बौद्धिक रुझान तथा बच्चों की स्वाभाविक शैली से दूरी नज़र आएगी। ये फ़िल्म फ़ेस्टिवल दूसरी चीज़ों को मद्देनज़र रखते थे और बच्चों का अलग अंदाज़ था यही कारण है कि इनमें से ज़्यादातर फ़िल्में जिन्हें फ़ेस्टिवल में पसन्द किया जाता था बाल फ़िल्में नहीं होती थीं। इन फ़िल्मों में लूट-खसोट, शोषण, जेल से रिहाई और अन्याय की तरफ़ सांकेतिक रूप में इशारा किया गया है और अत्याचार व दबाव में घिरे व्यक्ति को एक बाल या किशोर कलाकार के रूप में दिखाया गया है।

अब्बास किया रुस्तमी ईरान के प्रसिद्ध फ़िल्म निर्माता है और दुनिया में सिनेमा जगत में उनका जाना पहचाना नाम है। उन्होंने भी बाल व किशोर वैचारिक ट्रेनिंग केन्द्र से फ़िल्म निर्माण का सफ़र शुरु किया। वह वर्ष 1941 में तेहरान में पैदा हुए और उनकी बहुत सी फ़िल्मों को दुनिया भर के समीक्षकों ने सराहा।  वह 1969 से सिनेमा जगत में सक्रिय हैं और इस दौरान उन्होंने 41 लघु और फ़ीचर फ़िल्में बनायी हैं। वह सिनेमा के अलावा, शायरी, फ़ोटॉग्रफ़ी, संगीत, ग्रैफ़िक डीज़ाइन और चित्रकला में भी सक्रिय हैं। किया रुस्तमी को अनेक बड़े फ़िल्मी पुरस्कार मिल चुके हैं जिसमें केन फ़िल्म फ़ेस्टिवल में गोल्डेन पाम पुरस्कार, लोकार्नो फ़ेस्टिवल का कांस्य का तेंदुआ भी शामिल है। इसी प्रकार 2003 में उन्हें दुनिया के दस बड़े निर्देशकों की सूचि में शामिल किया गया।

 

किया रूस्तमी साठ के दशक में बाल व किशोर वैचारिक प्रशिक्षण केन्द्र गए और “ नानो कूचे ”, “ ज़न्गे तफ़रीह ” और “ मुसाफ़िर ” नामक फ़िल्में इसी केन्द्र में बनायी और विविधतापूर्ण फ़िल्म निर्माता के रूप में पहचान बनायी। फ़िल्म समीक्षक, सादगी, बाल कलाकारों को मुख्य भूमिका देना, डॉक्यूमेन्ट्री जैसी शैली में फ़िल्म का निर्माण, ग्रामीण लोकेशन और शायराना अंदाज़, अब्बास किया रुस्तमी की फ़िल्मों की विशेषताएं गिनवाते हैं।

 

 

अब्बास किया रुस्तमी ने क्रान्ति के बाद अपनी पसन्द की शैली में कई और फ़िल्में बनायीं और धीरे धीरे विदेशी फ़िल्म फ़ेस्टिवलों में ईरानी फ़िल्म निर्माता के रूप में पहचाने जाने लगे। ज़्यादातर समीक्षक उन्हें ऐसे सिनेमा का संस्थापक मानते हैं जिनका बहुत से फ़िल्म निर्माता अनुसरण करते हुए विदेशी फ़िल्म फ़ेस्टिवल में पहुंचने में सफल हुए।

किया रुस्तमी उन निर्देशकों में हैं जिन्होंने क्रान्ति के बाद ईरान में फ़िल्म निर्माण का काम जारी रखा और बारंबार कहा है कि ईरान में स्थायी रूप से रहने से फ़िल्म निर्माण की उनकी सलाहियत कई गुना निखर गयी। उन्होंने एक इंटर्व्यू में कहा था कि अगर किसी पेड़ को, जिसकी जड़ ज़मीन में हो, उसे किसी दूसरे स्थान पर ले जाया जाए तो वह फिर फल नहीं देता और अगर दे भी तो उसके फल में वह गुणवत्ता नहीं आती जैसी गुणवत्ता उसके असली स्थान पर रहने की हालत में होती है।

अब्बास किया रुस्तमी ने 1987 में “ ख़ाने दूस्त कुजा अस्त ” नामक फ़िल्म का निर्माण किया था। यह फ़िल्म एक लड़के के बारे में है जो अपने दोस्त की नोटबुक लौटाना चाहता है जो उसके पड़ोस के गांव में रहता है। पूरी फ़िल्म में ईरान की ग्रामीण जनता की परंपराओं को दिखाया गया है और इन सारी चीज़ों का वर्णन एक बच्चा करता है। ईरान के ग्रामीण क्षेत्र के दृष्यों को शायराना अंदाज़ में पेश करना, जीवन की हक़ीक़त को पेश करना, जिसमें बच्चा घिरा हुआ है, और इन समस्याओं से निकालने के लिए बच्चे से विशेष हल को पेश करना, इस फ़िल्म के सार्थक पहलू हैं।

किया रुस्तमी ने कुछ और फ़िल्मों में इसी फ़ार्मूले पर अमल किया है और ऐसी फ़िल्में बनायीं जिनका फ़ेस्टिवलों और अंतर्राष्ट्रीय समाजों को स्वागत किया गया। वह कई बार यह कह चुके हैं कि उन्हें राजनीति और राजनीति पर आधारित फ़िल्म बनाने में कोई दिलचस्पी नहीं है लेकिन उनकी ज़्यादातर फ़िल्मों की विदेश में राजनैतिक दृष्टि से समीक्षा की गयी। ऐसी शैली थी कि ईरान के भीतर कुछ फ़िल्म निर्माता भी यह सोचने लगे कि किया रुस्तमी जैसी फ़िल्म बना कर, विदेश में लोकप्रिय हो सकते हैं और फ़िल्म के बीच में कहीं अपने राजनैतिक विचार को फ़िल्मी अंदाज़ में पेश कर सकते हैं।     

 

 

नब्बे के दशक के बाद ईरानी सिनेमा में ऐसी फ़िल्में बनीं जिनमें मुख्य किरदार एक बच्चे या नौजवान का होता था। इन फ़िल्मों में जीवन की कठिनाइयों, बच्चों और नौजवानों को उनके परिवार के सदस्यों और समाज के न समझ पाने की मुश्किल को चित्रित किया गया है और ये फ़िल्में कभी कभी दर्शक को परेशान करने की हद तक आगे बढ़ जाती थीं। इस प्रकार की फ़िल्में बाल फ़िल्मों के नाम से मशहूर हुयीं जिनके निर्माता की मुख्य चिंता बच्चों की समस्याओं को बाल कलाकार के ज़रिए चित्रित करना थी। इस प्रकार की फ़िल्मों में कुछ बहुत ही अच्छी और कुछ बहुत ही कमज़ोर फिल्में बनीं किन्तु इन सब फ़िल्मों के दर्शक बच्चे नहीं हैं बल्कि ये फ़िल्में बड़ों को मद्देनज़र रख कर बनायी गयीं।

इस बीच जो बात अहम थी वह अंतर्राष्ट्रीय फ़ेस्टिवल की चकाचौंध थी कि जिसमें किसी ख़ास अवसर पर इस प्रकार की फ़िल्मों को पसंद किया जाता था और उनके निर्माताओं के लिए रेड कार्पेट बिछायी जाती थी। इस प्रकार की फ़िल्मों को दसियों पुरस्कार और विदेश में हौसला बढ़ाने वाली समीक्षाओं से इस प्रकार की फ़िल्मों के निर्माण में और बहुत से निर्माता आए और यह ईरान में फ़िल्म निर्माण की एक स्थायी शैली बन गयी। यह प्रक्रिया बहुत तेज़ी से जारी रही और मज़बूत हुयी मगर विदेशी फ़ेस्टिवलों के प्रबंधकों के मानदंड बदलने के कारण बाल फ़िल्मों की ओर ध्यान कम होता गया।

 

 

अलबत्ता इस संदर्भ में इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि किया रुस्तमी और कुछ दूसरे फ़िल्म निर्माता अपनी व्यक्तिगत रूचि के तहत बाल सिनेमा की ओर उन्मुख हुए। इस कार्यक्रम में हमारा उद्देश्य इन फ़िल्म निर्माताओं की फ़िल्मों की समीक्षा करना नहीं है बल्कि ईरान में फ़ेस्टिवल को मद्देनज़र रख कर बनने वाली फ़िल्मों के कारण का पता लगाना है।

इस कार्यक्रम में हमारी समीक्षा व बहस उन फ़िल्मों व फ़िल्म निर्माताओं के बारे में हैं जिन्होंने इस शैली को आदर्श बनाया और विदेश में उपस्थित होने तथा पश्चिमी फ़िल्म समीक्षकों की ओर से पुष्टि मिलने के लिए फ़िल्म निर्माण के लिए आगे बढ़े।

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