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बुधवार, 18 फ़रवरी 2015 16:47

अन्तर्राष्ट्रीय फ़िल्म समारोहों में ईरानी सिनेमा-2

अन्तर्राष्ट्रीय फ़िल्म समारोहों में ईरानी सिनेमा-2

इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म उत्सवों में ईरानी फ़िल्मों ने भरपूर उपस्थिति दर्ज की और विभिन्न पुरस्कार जीते। इस सफल उपस्थिति के बाद ईरान के फ़िल्म निर्माता व निर्दोशकों ने फ़िल्मों की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए प्रयास आरंभ कर दिये और इसके परिणाम में ईरानी सिनेमा जगत के कई आधारभूत परिवर्तन हुए।

 

 

यह मामला केवल यहीं तक सीमित नहीं रह गया बल्कि इस विषय को कई अन्य आयामों से भी देखा जा सकता है। ईरान में क्रांति को पैंतीस वर्ष का समय हो गया है और इस क्रांति पर विश्व के संचार माध्यमों का सदैव ध्यान रहा है और इस संबंध में सदैव चर्चा भी होती रही है। ईरान सांस्कृतिक व ऐतिहासिक दृष्टि से एक समृद्ध देश है और मध्यपूर्व के क्षेत्र में स्ट्रटैजिक स्थान रखता है। इसी प्रकार ईरान की इस्लामी क्रांति भी एक धार्मिक क्रांति है जबकि इससे पहले अन्य देशों में आने वाली क्रांतियां मार्क्सवादी थीं। ईरान की इस्लामी क्रांति की प्रवृत्ति के बारे में जानने की उत्सुकता, दुनिया के लिए महत्त्वपूर्ण थी और इस क्रांति के बारे में जो कुछ भी लिखा गया या बनाया गया, वह बहुत ही आकर्षक था।

 

क्रांतियों के साथ कुछ परिवर्तन भी होते हैं और बड़ी क्रांतियों में उथलपुथल अपरिहार्य है। इस उथल पुथल के दौरान, कुछ बिन्दु और विषय सामने आते हैं जो सामान्य रूप से कला और साहित्य के लिए नये और अछूते होते हैं और इससे आकर्षक वस्तुएं बनाने का स्रोत प्राप्त होता है। यह कहा जा सकता है कि यह समस्त तत्व एक दूसरे से मिल गये और ईरान में इस्लामी क्रांति के बाद सिनेमा जगत, विश्व के सिनेमाजगत के ध्यान का केन्द्र बन गया।

 

 

 

अलबत्ता इस बात को भुलाया नहीं जा सकता कि इस्लामी क्रांति के बाद ईरानी सिनेमा में विदेशी फ़िल्मों का रिलीज़ होना लगभग प्रतिबंधित हो गया और ईरानी सिनेमा, ईरानी सिनेमा उद्योग में काम करने वालों के लिए नये अनुभव हेतु विस्तृत मैदान था जिसके अनुभव का परिणाम बहुत प्रकाशमयी था और इसने ईरानी सिनेमा को गुणवत्ता की दृष्टि से बहुत परिवर्तित कर दिया।

 

 

यह उभरता हुआ सिनेमा, इस्लामी क्रांति के बाद के पहले कुछ वर्षों तक, पश्चिमी संचार माध्यमों द्वारा ईरान की क्रांति के बारे में प्रोपेगैंडा किए जाने के कारण वैश्विक सिनेमा जगत के ध्यान का केन्द्र न बन सका, यहां तक निर्माता व निर्देशक अमीर नादिरी ने दवन्दे नामक फ़िल्म बनाई और उसे विदेशों में दिखाया। इस फ़िल्म में ज़िन्दगी के उतार चढ़ाव में एक युवक के प्रयास और उसकी सहन शीलता को दिखाया गया है। फ़िल्म का मज़बूत स्क्रिप्ट और उसकी उच्च गुणवत्ता के कारण फ़िल्म सिनेमा जगत के लोगों के ध्यान का केन्द्र रही और वर्ष 1985 में फ़्रांस में आयोजित होने वाले Three Continents Festival पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

 

धीरे धीरे ईरानी सिनेमा विश्व के अन्य देशों के अन्य साथ ईरान का महत्त्वपूर्ण संपर्क चैनल बन गया और कई वर्षों तक विश्ववासी, ईरान को ईरानी फ़िल्मों के माध्यम से पहचानते रहे। यह वह फ़िल्में थीं जिन्हें इस क्षेत्र में प्रविष्ट होने वाले युवकों और ग़ैर अनुभवी लोगों ने बनाई थीं। अलबत्ता बहुत से फ़िल्म निर्माता, इस्लामी क्रांति की सफलता से पहले भी इस क्षेत्र में सक्रिय थे और उन्होंने कई फ़िल्में बनाईं। इन निर्देशकों में से कुछ ने क्रांति के पहले बच्चों और युवाओं पर भी फ़िल्में बनाईं थीं जो “वर्तमान सिनेमा” के नाम से प्रसिद्ध थीं। इस कहानी का मुख्य पात्र एक बच्चा या युवक होता था । जीवन की कठिनाइयों का अनुभव, बच्चों की दुनिया पर बड़ों द्वारा ध्यान न दिया जाना, बचपने में दृढ़ता और पवित्रता जैसे इस्लामी क्रांति से पहले और बाद के काल में इन फ़िल्मों में ध्यान दिया जाता रहा है और यही फ़िल्में ईरान में फ़िल्म उत्सव के गठन का कारण बनीं।

 

 

 

महत्त्वपूर्ण बिन्दु यह है कि पश्चिमी आलोचक इन फ़िल्मों को रूपक फ़िल्मों की संज्ञा देते थे और कभी कभी इन फ़िल्मों को बुद्धि की कल्पना से परे मानते थे। इन आलोचकों का प्रयास होता था कि इन फ़िल्मों के निर्माताओं व निर्देशकों को राजनैतिक हस्ती बताएं या इन्हें ईरान की क्रांति के विपक्षी दल की संज्ञा दें।

 

उदाहरण स्वरूप 1995 में बनने वाली सफ़ेद ग़ुब्बारा नामक फ़िल्म है, इस फ़िल्म की कहानी एक लड़की के चारो ओर घूमती है जो ईद की रात मछली ख़रीदने निकलती है किन्तु बहुत से पश्चिमी आलोचकों ने इस फ़िल्म को ईरानी सिनेमा और समाज की कटु कहानी का नाम दिया और उन्होंने फ़िल्म निर्माता की कटु बातें बयान करने के लिए प्रेरित किया। सिनेमा जगत के आलोचक जान ब्रोकज़ ने समाचार पत्र गार्डियन से बात करते हुए सफ़ेद ग़ुब्बारा नामक फ़िल्म को समकालीन तेहरान के उतार चढ़ाव का जीवंत प्रमाण बताया।  एक अन्य आलोचक लिखता है कि यह फ़िल्म, आज के तेहरान और वहां के रहने वालों का चित्रण है और वास्तविकता से बहुत निकट है।

 

 

अलबत्ता यह कहना चाहिए कि यह प्रचलन समय बीतने और पश्चिम द्वारा ईरानी समाज के बारे में अधिक जानकारी के बावजूद न केवल यह कि समाप्त नहीं हुआ बल्कि एक अन्य रूप में मौजूद है और इसने अंतर्राष्ट्रीय मंच पर ईरानी सिनेमा की उपस्थिति को बहुत प्रभावित किया है। आपने सीमीन से नादिर की जुदाई नामक फ़िल्म का नाम तो सुना ही होगा, इसका निर्देशन असग़र फ़रहादी ने किया और इसने हालिया दो वर्षों के दौरान क्षेत्रीय व अंतर्राष्ट्रीय मंच पर बहुत सफलताएं अर्जित की हैं।

 

इस फ़िल्म ने आस्कर एवार्ड भी जीता है। इसमें एक ईरानी दंपति की कहानी है जिनमें देश से पलायन करने के विषय पर मतभेद पैदा हो जाते हैं और अंततः दोनों ने एक दूसरे से अलग होने का फ़ैसला किया। इस फ़िल्म की स्क्रिप्ट बहुत मज़बूत है और इसमें पाये जाने वाले भावनात्मक पहलू बहुत प्रभावित करते हैं। पूरी दुनिया में इस फ़िल्म के बहुत से दर्शकों ने फ़िल्म के दौरान पारिवारिक संस्था की पवित्रता का आभास किया और इसकी प्रशंसा की। इस फ़िल्म की भी पश्चिमी आलोचकों की ओर से कड़ी आलोचना की गयी। उदाहरण स्वरूप न्यूयार्क टाइम्ज़ लिखता है कि एक महिला अपने पति के व्यवहारों से तंग आकर अदालत का सहारा लेती है किन्तु ऐसा प्रतीत नहीं होता कि ईरान की अदालतें एक महिला की जीवन के व्यक्तिगत मामलों को पेश करने का बेहतरीन स्थान हो। समाचार पत्र लिखता है कि यह फ़िल्म बहुत साधारण और ईरान के बारे में निराशाजनक चित्र पेश करती है जो शायद अमरीकी दर्शकों को पता भी हो।

 

 

 

संभव है कि आप यह सब बातें सुनकर कहें कि हर दर्शक को फ़िल्म देखकर उसके परिणाम निकालने का अधिकार है और इस प्रकार के बयान और लेख का ईरानी सिनेमा से कुछ लेना देना नहीं है। खेद की बात यह है कि ईरान में फ़िल्म निर्माण के इतिहास पर यदि नज़र डालें तो पता चलता है कि इसमें कुछ कटु बिन्दु पाये जाते हैं किन्तु ईरान से पश्चिम की शत्रुता के आयाम भी छिपे नहीं हैं। अस्सी के दशक में कुछ फ़िल्म निर्माता जो पश्चिम की प्रशंसा की कामना करते थे और उन्हें फ़्रांस की सीमा पर अपनी आशाओं की किरण दिखी, अमरीकी और यूरोपीय पत्रिकाओं के आलोचकों और फ़ेस्टेवल के प्रबंधकों की संवेदनशीलता समझ गये। उन्होंने कुछ स्थिर मानकों से लाभ उठाते हुए फ़िल्म निर्माण की और उन्हें विश्वास था कि वे पश्चिमी सिनेमा जगत में काफ़ी पसंद किए जाएंगे। विदेश में पेश की जाने वाली आरंभिक पहली फ़िल्में, निर्माता व निर्देशक की भीतरी इच्छाओं, क्षमताओं और उसकी रुचि के आधार पर बनीं थीं किन्तु बाद के काल की फ़िल्में ऐसी नहीं थीं। वास्तव में यह फ़िल्में केवल पुरस्कार जीतने और फ़िल्म उत्सवों में पेश करने के लिए बनी थीं और दिन प्रतिदिन उसके स्तर में गिरावट पैदा होती गयी।

 

इस प्रकार से विदेश फ़िल्मी मेलों में ईरानी सिनेमा की उपस्थिति की प्रक्रिया तेज़ होती गयी और क्षेत्रीय व अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं पर बहुत सी छोटी व लंबी फ़िल्में बनीं। यह फ़िल्में एक ही ढर्रे पर थीं और ढांचे व विषयों के घिसे पिटे होने के बावजूद, इस प्रकार की फ़िल्मों का विदेशों में बहुत स्वागत किया गया। रोचक बात तो यह है कि यह फ़िल्में देश के भीतर की स्थिति से पूर्ण रूप से भिन्न थीं, इसीलिए इन फ़िल्मों में से अधिकतर फ़िल्मों को सभी लोग नहीं देख पाते थे या यह कि फ़िल्म बुरी तरह पिट जाती थीं और बाक्स आफ़िस पर औंधे मुंह गिर पड़ी थीं। यह विषय इस बात का कारण बनी कि इन फ़िल्म निर्माताओं पर स्थानीय लोगों ने अधिक ध्यान नहीं दिया क्योंकि उन्होंने दूसरे लक्ष्यों को दृष्टि में रखकर फ़िल्में बनाईं हैं।

 

 

 

आने वाले वर्षों में यह फ़िल्में, फ़िल्म फ़ेस्टेवल के नाम से प्रसिद्ध हुईं और इसके निर्माताओं का भविष्य भी विचित्र हो गया। विदेशी फ़िल्म फ़ेस्टेवल में लोकप्रियता प्राप्त करने की उत्सुकता धीरे धीरे कम होती गयी और उनमें से कुछ नये मानदंडों पर फ़िल्म बनाने में सक्षम नहीं थे, उन्होंने इस काम से हाथ खींच लिया जबकि अन्य निर्माता विदेशों में चले गये और अपनी अपेक्षाओं के विपरीत कुछ सफलता अर्जित नहीं कर सके। कुछ अन्य लोगों ने भी अपने क्रोध और द्वेष के आधार पर ईरानी राष्ट्र और अपनी मातृभूमि से खुलकर शत्रुता की और चूंकि विदेशी और स्थानीय सिनेमा जगत में उनका कोई स्थान नहीं था, ईरान के विरुद्ध राजनैतिक गतिविधियां करने लगे और इस क्षेत्र में अपनी ख्याति को भुनाने लगे।

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