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बुधवार, 04 फ़रवरी 2015 12:41

अन्तर्राष्ट्रीय फ़िल्म समारोहों में ईरानी सिनेमा

अन्तर्राष्ट्रीय फ़िल्म समारोहों में ईरानी सिनेमा

ईरान में बनी फ़िल्मों का विदेशों में दिखाया जाना ऐसा विषय है जिसकी विभिन्न आयामों से समीक्षा की जा चुकी है।  इसपर विभिन्न दृष्टिकोणों से टीका-टिप्पणी की गई है।  इस कार्यक्रम के अतिरिक्त अगले कुछ अन्य कार्यक्रमों में भी हम इसी विषय पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

 

 

 

विश्व के विभिन्न देशों में आयोजित होने वाले फ़िल्म फ़ेस्टिवल का महत्व इसलिए भी होता है कि उनके माध्यम से विचारों और संस्कृतियों का आदान-प्रदान होता है।  इनकी एक विशेषता यह भी होती है कि फ़िल्म फ़ेस्टिवल में एसी फ़िल्में भी प्रदर्शित की जाती हैं जो अभी रिलीज़ नहीं हुई हैं।  वास्तव में फिल्म फेस्टिवल फिल्मों का मेला हुआ करते हैं जिसमें दुनियाभर के फिल्मकारों को एक स्थान पर इकट्ठा होने का मौका मिलता है।  फ़िल्म फेस्टिवल की आधारशिला रखने वालों का आरंभ में यह मानना था कि फ़िल्म महोत्सव न केवल भांति-भांति की फ़िल्में देखने का स्थल होता है बल्कि स्थानीय सिनेमा को प्रोत्साहित करने और विभिन्न देशों के फ़िल्म निर्माताओं और कलाकारों के बीच भेंटवार्ता का भी उचित स्थल है।

 

 

सिनेमा के समानांतर होने वाले परिवर्तनों तथा फ़िल्म निर्माताओं के विचारों में आने वाले बदलाव ने अधिकांश फ़िल्म समारोहों को प्रभावित किया है।  इसमें स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।  फ़िल्म समारोहों का वर्तमान मानदंड, उन फ़िल्म निर्माताओं को ढूंढना है जो सिनेमा जगत में कुछ नया करना चाहते हैं।  इस संबन्ध में एसे कई फ़िल्म निर्माताओं का नाम लिया जा सकता है जिन्होंने फ़िल्म समारोहों के माध्यम से विश्व ख्याति अर्जित की है। यह वे लोग हैं जिन्हें फ़िल्म फ़ेस्टिवलों के माध्यम से बहुत कुछ प्राप्त हुआ और यदि यह न होते तो वे भी आज उस स्थान पर नहीं होते जहां पर हैं।

 

 

इन विश्व विख्यात फ़िल्म निर्माताओं की कला और ख्याति के कारण हमें फ़िल्म फेस्टिवल आयोजित करने वालों को अनदेखना नहीं करना चाहिए।  ऐसा नहीं होना चाहिए कि हम सबको एक ही श्रेणी में रखें। दुनिया भर में हर महीने छोटे-बड़े दर्जनों फिल्म फेस्टिवेल होते हैं। सालभर का यदि आंकड़ा देखें तो इनकी तादाद सैकड़ों में है।  इनकी संख्या सैकड़ों में होने के बावजूद इन्हें विभिन्न प्रकर से वर्गीकृत किया गया है।  कहीं पर इन्हें विषय के हिसाब से तो कहीं पर कहानी या अन्य दृष्टि से वर्गीकृत किया जाता है।  उनमें से कुछ व्यापारिक दृष्टि से हैं इसलिए फ़िल्म का निर्माण करने वालों का आर्थिक समर्थन करने वाले इन्हें आयोजित करवाते हैं।  कुछ को दर्शकों की संख्या के हिसाब से वर्गीकृत किया जाता है जबकि कुछ फ़िल्म फेस्टिवलों का उद्देश्य, संस्कृति का विस्तार करना होता है।

 

 

संभव है कि यह बिंदु आपको आश्चर्य में डाल दे किंतु हमें यह बात स्वीकार करनी चाहिए कि फ़िल्म फेस्टिवल के जितने भी लाभ गिनाए जा सकते हैं उसके बावजूद इसके कुछ नकारात्मक प्रभाव भी हैं।  यह वह नकारात्मक आयाम है जिसे बहुत से देशों के सिनेमा जगत में देखा जा सकता है।  एसे भी निर्माता मौजूद हैं जो अस्पष्ट ढंग से फ़िल्मों का निर्माण करके झूठी कहानियों पर आधारित फ़िल्में बनाते हैं।  इस प्रकार वे लोग अपने इर्दगिर्द के वातावरण की अवास्तविक छवि प्रस्तुत करते हैं।  इस प्रकार से उस देश की छवि धूमिल होती है।

 

 

लगभग 55 वर्ष पूर्व ईरान की पहली फ़िल्म ने अन्तर्राष्ट्रीय फ़िल्म समारोह में भाग लिया था।  सन 1958 के बर्लिन फ़िल्म फ़ेस्टिवेल में जिस प्रथम ईरानी फ़िल्म ने भाग लिया उसका नाम था, “शब नशीनी दर जहन्नम”।  उसके बाद 80 के दशक के आरंभ में ईरान की कुछ डाक्यूमेंट्री फ़िल्में, अन्तर्राष्ट्रीय फ़िल्म समारोहों में भाग लेने में सफल रहीं।

 

इसी दशक के अंत में अधिक संख्या में ईरानी फ़िल्मों ने अन्तर्राष्ट्रीय फ़िल्म समारोहों में भाग लेकर इसके आयोजकों और आलोचकों के ध्यान को अपनी ओर आकृष्ट किया।  यह फ़िल्में अपनी विशेष शैली के कारण आलोचनीय फ़िल्मों के नाम से मशहूर हुईं।  इस प्रकार की फ़िल्में, न केवल यह कि अपने बनाने वालों की अच्छी छवि बना रही थीं बल्कि उस शासन के लिए भी सकारात्मक समझी जाती थीं जो कठोर सेंसर शिप के लिए मशहूर था।

 

एक ईरानी लेखक और निर्माता “दारयूश मेहरजूई” ने इस्लामी क्रांति के पूर्व के वर्षों में फ़िल्म समारोहों में उपस्थिति का कीर्तिमान स्थापित किया था।  उस काल में “गाव” और “पुस्तची” जैसी उनकी फ़िल्मों ने अन्तर्राष्ट्रीय फ़िल्म फेस्टिवल्स में भाग लिया।  उनकी इन फ़िल्मों की बहुत सराहना की गई।  दारयूश मेहरजूई की फ़िल्मों ने इस्लामी क्रांति से पूर्व शिकागो, लंदन, वेनिस, पेरिस, मास्को, बर्लिन और कान्स फ़िल्म समारोहों में भाग लेकर पुरस्कार अर्जित किये।

 

सन 1971 के वेनिस फ़िल्म समारोह में एक आलोचक और टीकाकार सरजूफ्रोसाली ने Natsyvnh नैटसिवेन पत्रिका में लिखा था कि ईरानी निर्माता “दारयूश मेहरजूई” की फ़िल्म “गाव” देखने के बाद मुझे इस फ़िल्म निर्माता के ज्ञान और उसकी गहरी जानकारी ने बहुत प्रभावित किया।  उन्होंने लिखा कि फ़िल्म को देखकर मुझे फ़िल्म सिनेमा के महारथियों जैसे जान बोनोएल और अन्य लोगों की याद आई।

 

 

अन्तर्राष्ट्रीय फ़िल्म समारोहों में ईरानी फ़िल्मों की भागीदारी का मुख्य कारण संभवतः यह रहा है कि दर्शकों को अज्ञात भूमि के बारे में पता चले।  वे लोग चाहते थे कि फ़िल्मों के माध्यम से ईरान की राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक स्थिति से अवगत हुआ जाए।  वे लोग चाहते थे कि उन्हें उस भूमि के बारे में अधिक से अधिक जानकारी एकत्रित हो सके जो उनके लिए अभी तक रहस्यमई रही है और इसके बारे में वे जानने के इच्छुक हैं।

 

यह भी एक वास्तविकता है कि ईरान में इस्लामी क्रांति की सफलता से पूर्व ईरानी सिनेमा, समाज की वर्तमान वास्तविकताओं को प्रदर्शित करने में गंभीर नहीं था।  यहां तक कि बहुत से निर्माता और निर्देशक, अपने स्थानीय दर्शकों को भी वास्तविकता से अवगत कराने में बहुत कम दिलचस्पी लेते थे।  इन निर्माताओं की फ़िल्में सामान्यतः दो भागों में विभाजित हुआ करती थी।  एक में सांस्कृतिक दृष्टि से पिछड़ेपन को दिखाकर लोगों की आस्था और उनके विश्वास का मज़ाक़ उड़ाया जाता था जबकि दूसरे में विदेशियों की प्रशंसा और उनके प्रति अपने आदर और सम्मान को दर्शाया जाता था।  इसी प्रकार की फ़िल्में ही फ़िल्म समारोहों में भाग लेने योग्य होती थीं।

 

दूसरा भाग वह था जिसमें सामान्यतः एसी फ़िल्में बनाई जाती थीं जिसमें कल्पनाओं की उड़ान को प्रदर्शित किया जाता था और बहुत छोटी एवं सतही सोच को दिखाया जाता था।  देश के भीतर के सिनेमाघरों में इसने अपनी अच्छी जगह बना ली थी।  इस प्रकार की फ़िल्मों में अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर टिकने ही क्षमता नहीं होती थी इसीलिए वे फिल्म समारोहों का भाग नहीं बन सकीं।  इसके मुक़ाबले में वे फ़िल्में जिनमें वास्तविकता को प्रदर्शित किया गया और जो देखने में साधारण सी लगती थीं, अन्तर्राष्ट्रीय फ़िल्म समारोहों में भाग लेने में सफल रहीं।

 

 

 

ईरान की फ़िल्मों ने अबतक 2500 अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कार अर्जित किये हैं।  सर्वेक्षणों से ज्ञात होता है कि ईरान में इस्लामी क्रांति की सफलता से पूर्व फ़िल्म निर्माताओं ने 152 पुरस्कार हासिल किये थे।  बाक़ी पुरस्कारों को इस्लामी क्रांति के बाद में बनने वाली फ़िल्मों ने प्राप्त किया।

 

 

इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद कुछ समय के लिए ईरान की फ़िल्में, अन्तर्राष्ट्रीय फ़िल्म फेस्टिवल में भाग नहीं ले सकीं और एक समय तक लंबा अंतराल बना रहा किंतु 1980 के दशक के बाद से इन फ़िल्मों ने फिल्म समारोहों में अपनी उपस्थिति दर्जा करानी आरंभ कर दी।  अब स्थिति यह हो चुकी है कि शायद ही कोई एसा अन्तर्राष्ट्रीय फ़िल्म फेस्टिवल आयोजित हो जिसमें ईरान की फ़िल्में मौजूद न हों।  अन्तर्राष्ट्रीय फ़िल्म समारोहों में ईरान ने अबतक बहुत अधिक पुरस्कार प्राप्त किये हैं और यह प्रक्रिया आगे भी जारी रहेगी।

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