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बुधवार, 26 नवम्बर 2014 14:53

शहीद सैयद मुर्तज़ा आवीनी

शहीद सैयद मुर्तज़ा आवीनी

 

शहीद सैयद मुर्तज़ा आवीनी, इस्लामी क्रांति के बाद ईरान के कला व सिनेमा के मैदान की एक महत्वपूर्ण हस्ती हैं। उनका कहना था कि इस बात में कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि जो लोग कला के क्षेत्र में नैतिकता पर अधिक कटिबद्ध हैं वे तथ्यपरक सिनेमा या डॉक्यूमेंटरी फ़िल्म के क्षेत्र में आएं क्योंकि इसी सिनेमा में वास्तविकताओं के संबंध में सच्चाई प्रस्तुत करने की अधिक संभावना रहती है।

 

सैयद मुर्तज़ा आवीनी का जन्म वर्ष 1947 में तेहरान के उपनगरी क्षेत्र शहरे रै में हुआ। उन्हें बचपन ही से कला से लगाव था। वे कविताएं, निबंध और कहानियां लिखते तथा चित्रकारी करते। बचपन और किशोरावस्था गुज़रने के बाद उन्होंने तेहरान विश्वविद्यालय में वास्तुकला की पढ़ाई आरंभ की और उसी समय से साहित्य, कविता, संगीत और चित्रकला के सबंध में अध्ययन शुरू कर दिया और कला की बैठकों में सक्रिय रूप से भाग लेने लगे।

वर्ष 1979 में ईरान में इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद और स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी के आदेश से निर्माण संबंधी संघर्ष की संस्था के गठन के बाद आवीनी इस क्षेत्र में सक्रिय हो गए और ग्रामीण क्षेत्र के लोगों की समस्याओं के निवारण के लिए देश के दूरस्थ क्षेत्रों की ओर रवाना हो गए। उन्होंने शाह की सरकार द्वारा समाज के इस वर्ग पर किए गए अत्याचारों को देखने के बाद, उक्त संस्था के लिए फ़िल्में बनाने का निर्णय किया और ख़ान गज़ीदेहा अर्थात ज़मींदारों के अत्याचार सहन करने वाले लोग के नाम से पहली टीवी श्रृंखला तैयार की। इस धारावाहिक में आवीनी ने वंचित देहातों के रहने वालों के साथ सहानुभूति जताने के साथ, इस वर्ग पर ध्यान दिए जाने की आवश्यकता पर बल दिया।

मुर्तज़ा आवीनी ने अपने जीवन में सौ से अधिक डॉक्यूमेंटरी फ़िल्मों का संकलन व निर्माण किया, वर्षों तक इस्लामी संस्कृति प्रचार संस्था के लिए सांस्कृतिक काम करते रहे और और कला के क्षेत्र में सूरे नामक मासिक पत्रिका के संपादक रहे। उन्होंने इसी प्रकार कई पुस्तकें और आलेख भी लिखे हैं जिनमें से आईनए जादू, आग़ाज़ी पर येक पायान, फ़त्हे ख़ून, इमाम ख़ुमैनी की ग़ज़लों की व्याख्या, गिरदाबे शैतान और दसियों आलेखों की ओर संकेत किया जा सकता है। आईनए जादू उनकी एक महत्वपूर्ण किताब है जिसमें सिनेमा के बारे में उनके रोचक विचारों व दृष्टिकोणों का उल्लेख किया गया है। इस किताब को पढ़ने से पता चलता है कि सिनेमा की कला के बारे में शहीद मुर्तज़ा आवीनी के विचार बिलकुल अलग थे और वे इसे एक नए व अछूत कोण से को देखते थे। नौ अप्रैल वर्ष 1993 में दक्षिण पश्चिमी ईरान के फ़क्के क्षेत्र में एक डॉक्यूमेंटरी फ़िल्म के निर्माण के दौरान, इराक़ द्वारा ईरान पर थोपे गए युद्ध के काल की बची हुई एक बारूदी सुरंग के फट जाने से वे शहीद हो गए। आवीनी के शहीद होने के दिन को कवियों, लेखकों और कलाकारों के प्रस्ताव पर इस्लामी क्रांति की कला के दिन का नाम दिया गया है।

 

 

रिवायते फ़त्ह मुर्तज़ा आवीनी के एक डॉक्यूमेंटरी कार्यक्रम का शीर्षक है जिसमें सद्दाम शासन द्वारा ईरान पर थोपे गए आठ वर्षीय युद्ध की सैन्य घटनाओं का चित्रण किया गया है। इस डॉक्यूमेंटरी कार्यक्रम का निर्माण थोपे गए युद्ध के आरंभ में शुरू हुआ और उनकी मृत्यु तक जारी रहा। यह कार्यक्रम ईरानी टीवी के पहले चैनल से निरंतर प्रसारित होता रहा। इस कार्यक्रम में रणक्षेत्र में घटने वाली घटनाओं की समीक्षा की जाती थी और योद्धाओं के साक्षात्कार प्रसारित किए जाते थे। इस कार्यक्रम के हर भाग में ईरानी सैनिकों की किसी एक कार्यवाही का भी चित्रण किया जाता था। यह कार्यक्रम पांच खंडों पर आधारित था जिनमें वलफ़ज्र-8, कर्बला-1, कर्बला-5 और कर्बला-10 जैसे पिछले कुछ सैन्य अभियानों तथ वर्ष 1987 की राजनैतिक व सांस्कृतिक घटनाओं का वर्णन किया गया।

 

 

शहीद आवीनी ने इस कार्यक्रम में आवाज़ व चित्रों का जिस प्रकार से मिश्रण किया वह अनूठा था। हम सभी जानते हैं कि युद्ध में कैमरा प्रायः कटु घटनाओं का ही चित्रण करता है और रिवायते फ़त्ह में भी यद्यपि इस प्रकार की कटु बातों का उल्लेख होता था किंतु वह आशा भी जगाता था और लोगों में गर्व की भावना भी उत्पन्न करता था और लोग रणक्षेत्र के आध्यात्मिक वातावरण में न जा पाने के कारण अफ़सोस करते थे। यह कार्यक्रम वस्तुतः योद्धाओं और रणक्षेत्र के वातावरण का प्रेमी था और यही प्रेम लोगों तक स्थानांतरित करता था।

 

ईरान के सभी सिनेमा आलोचक और कला के विशेषज्ञ, टीवी कार्यक्रम रिवायते फ़त्ह को ईरानी सिनेमा का एकमात्र ऐसा डॉक्यूमेंटरी कार्यक्रम मानते हैं जिसमें चरित्रों का सजीव चित्रण किया गया है। इस कार्यक्रम में युद्ध का एक विशेष ढंग से चित्रण किया गया है जो उससे पहले तक किसी भी कार्यक्रम में नहीं देखा गया था। इसमें ऐसा प्रतीत होता है मानो फ़िल्म निर्माता स्वयं रणक्षेत्र में उपस्थित लोगों में से एक है और अपने मित्रों तथा योद्धाओं की शौर्यगाथा का उल्लेख कर रहा है। कैमरा उसकी आंखों के समान है जो निरंतर उसके दोस्तों को खोजता रहता है। फ़िल्म निर्माता, योद्धाओं से हाल-चाल पूछता है, उनकी भावनाओं के बारे में प्रश्न करता है और उसी समय अपनी भावनाएं भी बड़े भावुक अंदाज़ में साहित्यिक ढंग से बयान करता है। यहां तक कि कुछ अवसरों पर उनके सुख-दुख से भी प्रभावित होता है और अपनी प्रतिक्रिया संगीत या मौन के माध्यम से जताता है।

 

 

अपनी डॉक्यूमेंटरी फ़िल्मों में शहीद मुर्तज़ा आवीनी का सबसे महत्वपूर्ण कार्य, व्यक्तित्व का चित्रण है, यह चित्रण कभी व्यक्तिगत होता है तो कभी सामूहिक। वे योद्धाओं को आम लोगों के समान नहीं समझते और उनका कैमरा, रिवायते फ़त्ह के विभिन्न भागों में एक नई पहचान के साथ योद्धाओं की एकजुट छवि पेश करता है। इसी प्रकार शहीद आवीनी की एक प्रमुख विशेषता जो उनकी फ़िल्मों से स्पष्ट होती है, यह है कि वे दर्शकों के प्रति बहुत गंभीर थे। उनका मानना था कि सबसे पहले दर्शक को पहचानना चाहिए और फिर कोई फ़िल्म बनानी चाहिए ताकि उससे संपर्क स्थापित हो सके। इसी विचार के साथ वे तकनीक को उस विषय के वर्णन के लिए प्रयोग करते थे जो उनके और उनके दर्शक के लिए स्वीकार्य होता था और दोनों ही उस पर विश्वास रखते थे। दूसरे शब्दों में उनका मानना था सिनेमा की तकनीक को स्थानीय बनाना चाहिए और हर संस्कृति की दृष्टि से उसे स्थानीय बनाने में अंतर होगा।

 

 

मुर्तज़ा आवीनी का कहना था कि कार्य संबंधी प्रतिबद्धताएं नहीं बल्कि कलाकारों की आंतरिक भावनाएं उन्हें पवित्र प्रतिरक्षा के मोर्चों पर ले जाती हैं। शूटिंग करने वाली टीमें भी उसी भावना के साथ काम करती थीं जिस भावना के अंतर्गत योद्धा रणक्षेत्र में जाते थे। रणक्षेत्र ऐसा स्थान नहीं था जहां केवल तकनीक या कला ही काम हो। कलाकारों, कैमरामैन और चित्रकारों की यही भावना और प्रतिबद्धता थी जिसने आवीनी को, कैमरे, फ़िल्म और फ़िल्मी संचार माध्यमों की वास्तविकता पर पुनर्विचार करने पर विवश किया और इसका परिणाम ईरानी सिनेमा इस्लामी क्रांति के बाद की कला के बारे में उनके विचारों पर आधारित विभिन्न आलेखों के रूप में सामने आया।

 

रिवायते फ़त्ह नामक डॉक्यूमेंटरी कार्यक्रम 98 भागों में बनाया गया है और पिछले वर्षों में कई बार इसे टीवी पर प्रदर्शित किया गया है। अब भी इस कार्यक्रम को पसंद करने वाले असंख्य लोग हैं और जितना उत्साह इस कार्यक्रम को देखने के संबंध में दिखाई देता है वह किसी अन्य कार्यक्रम के संबंध में नहीं दिखाई देता। ईरान की एक फ़िल्म निर्माता इन्सिया शाह हुसैनी इस कार्यक्रम की सफलता के बारे में कहती हैं कि यदि इस कार्यक्रम में से शहीद आवीनी की आवाज़ को समाप्त कर दिया जाए तो फिर शायद यह अन्य डॉक्यूमेंटरी फ़िल्मों व कार्यक्रमों से अधिक भिन्न नहीं रहेगा। यद्यपि यह बात पूर्ण रूप से स्पष्ट है कि युद्ध के अग्रिम मोर्चों के निकट बहुत ही अच्छे व असाधारण चित्र लिए गए हैं किंतु महत्वपूर्ण बात वह आयाम है जो शहीद आवीनी ने उन्हें प्रदान किये हैं। उन्होंने मोर्चों की घटनाओं को अपने आशूराई विचारों के साथ जोड़ कर उन्हें अमर बना दिया है। जिस प्रकार से कि आशूरा की घटना दोहराई नहीं जा सकती उसी प्रकार से रिवायते फ़त्ह कार्यक्रम भी पुराना नहीं होगा जब यह संस्कृति, आज की एक युद्ध संबंधी फ़िल्म के साथ सामने आएगी तो निश्चित रूप से अमर हो जाएगी।

 

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