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बुधवार, 26 नवम्बर 2014 14:49

पवित्र प्रतिरक्षा के बारे में बनाई जाने वाली फ़िल्में

मसऊद जाफ़री जूज़ानी मसऊद जाफ़री जूज़ानी

 

ईरान की इस्लामी क्रांति को सफल हुए अभी एक साल और सात महीने का ही समय गुज़रा था।  हर ओर परिवर्तन दिखाई दे रहा था।  अन्य क्षेत्रों की भांति कला और संस्कृति के क्षेत्र में भी तेज़ी से परिवर्तन हो रहे थे।  इस्लामी क्रांति की सफलता के साथ कलाकारों ने नए-नए अनुभव करने आरंभ किये और फ़िल्म निर्माताओं ने इनपर फ़िल्में बनाईं।  फ़िल्म निर्माताओं ने तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियों पर फ़िल्में बनानी आरंभ कर दी थीं।

 

22 सितंबर 1980 को सद्दाम ने ईरान पर आक्रमण कर दिया।  यह आक्रमण ईरान की पश्चिमी और दक्षिण पश्चिमी सीमा पर किया गया था।  यह तिथि, थोपे गए आठ वर्षीय युद्ध का आरंभ बिंदु बनी।  इस दौरान सद्दाम ने अमरीका और पश्चिम का प्रतिनिधित्व करते हुए ईरानी राष्ट्र को घुटने टेकने पर विवश करने का भरसक प्रयास किया।  हालांकि यह प्रयास किसी भी स्थिति में सफल नहीं हो सके क्योंकि ईरानी राष्ट्र के जियालों ने पवित्र प्रतिरक्षा के दौरान अद्वितीय प्रतिरोध का प्रदर्शन किया।  उनके इसी प्रतिरोध ने ईरानी जियालों के अदम्य साहस को विश्ववासियों के सामने प्रस्तुत किया।

 

युद्ध के आरंभ के साथ ही ईरानी सिनेमा ने रणक्षेत्र में प्रवेश किया।  यह बात निश्चित रूप से कही जा सकती है कि पिछले तीन दशकों के दौरान ईरानी सिनेमा का एक सशक्त बिंदु वे फ़िल्मे हैं जिन्हें पवित्र प्रतिरक्षा के विषय पर बनाया गया है।  ईरान के महत्वपूर्ण फ़िल्म निर्माताओं में वे हैं जिन्होंने प्रतिरक्षा के विषय पर फ़िल्में बनाई हैं।

 

डाक्यूमेंट्री फ़िल्मों के बारे में कहा जा सकता है कि थोपे गए युद्ध के आरंभिक काल से ही बहुत से लोगों ने मोर्चें पर घटने वाली घटनाओं को रेकार्ड करने का काम आरंभ कर दिया था।  इन लोगों ने युद्ध ग्रस्त क्षेत्रों के दौरे किये और वहां घटने वाली घटनाओं को अपने कैमरों में क़ैद कर लिया। यह फ़िल्में डाक्यूमेंट्री फिल्मों के रूप में मौजूद हैं।  इन रिपोर्टों को आम लोगों ने तैयार किया है।  यही कारण है कि इनमे एक डाक्यूमेंट्री फ़िल्म की विशेषता नहीं पाई जाती।  यह विषय, इसके एतिहासिक आयाम को कम नहीं करता।

 

वह प्रथम गुट जिसने थोपे गए युद्ध की घटनाओं की तस्वीरें लेने के लिए युद्ध के मोर्चे का रुख़ किया फ़ोटोग्राफ़र थे।  यह लोग व्यक्तिगत रूप में या गुट के रूप में ईरान के पश्चिमी और दक्षिण पश्चिमी मोर्चों पर गए थे।  ये लोग युद्ध ग्रस्त नगरों, देहातों और छोटे बड़े सभी क्षेत्रों तक गए।  सईद सादेक़ी ईरान के ऐसे ही एक फोटोग्राफ़र हैं जो सबसे पहले रणक्षेत्र की फ़िल्म लेने वहां पहुंचे थे।  इस बारे में वे कहते हैं कि फोटोग्राफ़रों ने विषम परिस्थतियों में अपने छोटे कैमरों से युद्धरत क्षेत्रों के नेचुरल चित्र लिए।  यह चित्र, ईरानी जनता द्वारा अपनी इस्लामी क्रांति की सुरक्षा के लिए किये जाने वाले प्रतिरोध को दर्शाते हैं।

ईरान के विरुद्ध सद्दाम की ओर से थोपे गए युद्ध की समय सीमा के  बढ़ने के साथ ही फ़िल्म निर्माताओं विशेषकर डाक्यूमेंट्री बनाने वालों ने इस क्षेत्र की ओर अपने क़दम बढ़ाए।  “ख़ुर्रमशहर शहरे ख़ून” और “शहरे इश्क़” वे फ़िल्मे हैं जो थोपे गए युद्ध के बारे में बनाई गई थीं।  इसके कैमरामैन महमूद बहादुरी थे।  यह फ़िल्में उन फ़िल्मों में हैं जिन्हें 1982 के प्रथम फ़ज्र फ़िल्म फेस्टिवल में प्रदर्शित किया गया था।  इसके अतरिक्त “आबादान शहरे मज़लूम” भी थोपे गए युद्ध के आरंभिक काल की एक डाक्यूमेंट्री हैं जिसका निर्देशन मुहम्मद रज़ा इस्लामलू ने किया था।

 

युद्ध के विषय पर बनाई जाने वाली फ़िल्मों में एक फ़िल्म का नाम “पुले आज़ादी” है।  दो घंटे वाली इस फ़िल्म का निर्देशन मेहदी मदनी ने किया था जबकि कैमरामैन थे फ़रहाद सबा।  यह फ़िल्म 1982 में बनाई गई थी।  ईरान के ख़ुर्मशहर का अतिग्रहण हो जाने के बाद ईरानी कमांडरों ने इसे स्वतंत्र कराने के लिए विभिन्न प्रकार की शैलियों पर विचार किया।  इन शैलियों में से एक, कारून नदी पर एक पुल बनाना भी था।  पुले आज़ादी नामक फ़िल्म युद्ध की कठिन परिस्थितियों में ईरानी जियालों द्वारा कारून नदी पर पुले आज़ादी बनाए जाने का चित्रण करती है।  बैतुल मुक़द्दस सैन्य अभियान के दौरान ईरानी सेना इसी पुल के माध्यम से ख़ुर्रम शहर में प्रविष्ट होने में सुफल हुई थी।  इसी विषय को पुले आज़ादी में बड़े ही सुन्दर ढंग से प्रस्तुत किया गया है।

 

डाक्यूमेंट्री बनाने वालों में एक “सय्यद मुर्तज़ा आवीनी” भी है।  उन्होंने युद्ध के आरंभिक काल में “फ़त्हे ख़ून” नामक सीरिया बनाया था।  उनका यह सीरियल उन युवाओं के लिए आदर्श बन गया जो युद्ध के बारे में डाक्यूमेंट्री बनाने के प्रयास में थे।  आवीनी, ने “हक़ीक़त” नाम की एक डाक्यूमेंट्री भी बनाई थी।  उनका मानना था कि बहुत सी डाक्यूमेंट्री फ़िल्में किसी फ़िल्म की कोख से जन्म लेती हैं।  इस बारे में वे कहते हैं कि इराक़ी सेना के हाथों ख़ुर्रमशहर के पतन से पहले युद्ध के संबन्ध में “फ़्तहे ख़ून” नामक फ़िल्म बनाई गई थीं।  इस फ़िल्म के प्रदर्शन के मात्र एक सप्ताह के बाद ख़ुर्रमशहर का पतन हो गया।  वास्तविकता को जानने के लिए हमने आबादान का रुख़ किया जो परिवेष्टन में था।  हमारे इस प्रयास का परिणाम 11 क़िस्तों में बनने वाले एक सीरियल के रूप में सामने आया जिसका नाम हक़ीक़त था।  इसमें थोपे गए युद्ध के आरंभिक दो वर्षों के दौरान आबादान, सूसंगेर्द और देज़फ़ूल में घटने वाली घटनाओं का चित्रण किया गया है।

 

इतना सब होने के बावजूद यह कहा जा सकता है कि युद्ध के बारे में डाक्यूमेंट्री बनाने का काम किसी एक व्यक्ति या गुट से विशेष नहीं था।  सन 1982 में अहवाज़ नगर के छात्रों के एक गुट ने, जिन्हें फ़िल्म बनाने में रुचि थी, “गुरूहे चेहल शाहिद” नामक फ़िल्म बनाई थी।  छात्रों का यह गुट सुपर-8 कैमरे के साथ मोर्चे पर पहुंचा था।  इनमे से 7 लोग, फ़िल्म बनाने के दौरान शहीद हो गए।  बाक़ी बचे छात्रो ने मोर्चे पर बहुत से चित्र लिए जिनसे बाद में “आज़ादी ये ख़ुर्रमशहर” नामक फ़िल्म बनाई गई।

 

इसके बाद फ़िल्म निर्माण करने वालों के गुट ने सामूहिक रूप से एक टेलिविज़न धारावाहिक बनाया जिसे राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न चैनेलों से प्रसारित किया गया।  इनमे से एक का नाम “शाहिदाने ईसार” और एक अन्य का “रवायते फ़त्ह” था जिसने रणक्षेत्र में रहकर थोपे गए युद्ध के बारे में यादगार फ़िल्म बनाई।

इस दौरान बनाई जाने वाले डाक्यूमेंट्री फ़िल्मों में “नीम निगाही बे जिबहये जुनूब” “मरसिये हलबचे” और ज़िंदगी दर इरतेफ़ाआत” का नाम लिया जा सकता है।

 

उस काल में डाक्यूमेंट्री बनाने वालों में इब्राहीम हातमी किया, अहमद रज़ा दरवीश, रसूल मुल्ला क़ुलीपूर का उल्लेख किया जा सकता है।  इसके अतरिक्त भी कई डायरेक्टर हैं जिनका उल्लेख किया जा सकता है।  जैसाकि हमने बताया इनमें से एक सैयद मुर्तज़ा आवीनी हैं जो अपने कार्य के कारण बाग़ में खिले हुए लाल गुलाब की भांति हैं।  उन्होंने अपने जीवन के अन्तिम समय तक फ़िल्म निर्माण का कार्य किया और अंततः इसी मार्ग में वे शहीद हो गए।

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