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मंगलवार, 25 नवम्बर 2014 16:35

डॉक्यूमैंट्री फ़िल्म

मसऊद जाफ़री जूज़ानी मसऊद जाफ़री जूज़ानी

डॉक्यूमैंट्री फ़िल्म एक ऐसी फ़िल्म होती है जिसमें काल्पनिक कहानी और घटनाओं के लिए कोई जगह नहीं होती है, बल्कि उसमें वास्तविक घटनाओं को उसी तरह दर्शाया जाता है जैसी वह हैं, और जहां तक संभव होता है उसमें वास्तविकता के साथ छेड़छाड़ नहीं की जाती है। यही कारण है कि में फ़िल्म में लोगों, स्थानों और वास्तविक घटनाओं को विषय बनाया जाता है।

 

बहरहाल वास्तविकता को दिखाने में भी कांट-छांट की जा सकती है, इसीलिए किसी भी डॉक्यूमैंट्री फ़िल्म की समीक्षा इस आधार पर की जानी चाहिए कि उसके निर्माता ने इसमें कांच-छांट की है। हालांकि जो एक संयुक्त बिंदु तमाम डॉक्यूमैंट्री फ़िल्मों में देखा जा सकता है वह यह है कि इन डॉक्यूमैंट्री फ़िल्मों में वास्तविकता को दर्शाने का प्रयास किया जाता है।

 

1926 में पहली बार ब्रितानी फ़िल्म निर्माता जॉन ग्रीसन ने इन नाम का प्रयोग किया था। उसके बाद उन्होंने इस शब्द की परिभाषा करते हुए कहा कि इसका मतलब है, वास्तविकता के साथ रचनात्मक ढंग से पेश आना। उसके बाद, 1984 में विश्व डॉक्यूमैंट्री सिनेमा संगठन ने इस नाम को औपचारिकता दे दी और डॉक्यूमैंट्री फ़िल्म की यूं परिभाषा की। इस फ़िल्म का हर आयाम वास्तविकता पर आधारित होता है, इस तरह से कि वास्तविक दृश्यों की शूटिंग की जाए और उसमें किसी तरह का फेरबदल न किया जाए, हां उसमें बहुत ही तार्किक ढंग सच्चाई से एडिटिंग की जा सकती है। यह काम लोगों की जानकारी में वृद्धि के उद्देश्य से होना चाहिए और लोगों की समस्याओं और उनके हल को बहुत ही वास्तविक रूप में पेश किया जाना चाहिए। 

 

डॉक्यूमैंट्री शब्द कई तरह की फ़िल्मों के लिए इस्तेमाल किया जाता है, जैसे कि एडवरटाइज़ फ़िल्में, सामाजिक फ़िल्में, एतिहासिक और राजनीतिक फ़िल्मों का नाम लिया जा सकता है।

 

सिनेमा की शुरूआती फ़िल्मों को भी डॉक्यूमैंट्री कहा जाना चाहिए। ल्यूमीर बंधुओं ने प्रारम्भ में कुछ ऐसी फ़िल्में बनाई थीं कि जो लोगों के आम जीवन पर आधारित थीं। अमरीका में भी एडीसन और उनके साथी दफ़्तरों में घटने वाली घटनाओं की फ़िल्म बनाते थे। दूसरे देशों में भी जैसे ही यह उद्योग क़दम रखता था इस तरह की फ़िल्मों का निर्माण शुरू हो जाता था।

 

आज के समय में प्रचलित डॉक्यूमैंट्री फ़िल्मों के निर्माण की शुरूआत 1922 में रॉबर्ट फ़िलाहर्टी की फ़िल्म ननूक ऑफ़ द नॉर्थ से हुआ, जो कनाडा में रहने वाले स्कीमोज़ की कहानी पर आधारित थी। फ़िल्म के नए विषय और बेहतरीन वीडियोग्राफ़ी तथा रचनात्मक एडिटिंग ने इस फ़िल्म को काफ़ी लोकप्रिय बना दिया था।

 

ननूक ऑफ़ द नॉर्थ फ़िल्म की सफ़लता और उसका कम बजट कारण बना कि अमरीकी फ़िल्म उद्योग डॉक्यूमैंट्री फ़िल्मों की ओर ध्यान दे। फ़िलाहर्टी ने एक और फ़िल्म मोआना बनाई कि जो एक क़बीले के लोगों के जीवन पर आधारित थी।

 

 

लेकिन हमें यह याद रखना चाहिए कि सामाजिक घटनाक्रमों जैसे कि क्रांतियां और युद्धों ने डॉक्यूमैंट्री फ़िल्मों को बहुत प्रभावित किया।

 

ईरान में डॉक्यूमैंट्री फ़िल्मों की शुरूआत 20वीं शताब्दी के आरम्भ से हुई। इब्राहीम ख़ान अक्कास बाशी ने ईरान में पहली डॉक्यूमैंट्री फ़िल्म बनाई। उसके बाद, क़ाजारी शासनकाल में अज़ादारी और अन्य रीति रिवाजो के विषय पर भी डॉक्यूमैंट्री फ़िल्मों का निर्माण किया गया।

 

रूसी ख़ान ने 1909 में आशूरा के दिन अज़ादारी की फ़िल्म बनाई। ख़ान बाबा मोतसदी ने भी डॉक्यूमैंट्री फ़िल्में बनाईं और विदेश में अनुभव प्राप्त करने के बाद उन्होंने बाग़ों और नर्सरियों पर फ़िल्में बनाईं और उसके बाद दरबारियों के जीवन पर आधारित फ़िल्म बनाई।

 

प्रारम्भ में ईरान में बनने वाली डॉक्यूमैंट्री फ़िल्मों को विभिन्न विषयों में बांटा जा सकता है। वास्तविकता, पर्यटन, शिक्षा, रिपोर्ट, एडवरटाइज़मैंट, शायरी और इतिहास।

लेकिन हमें इस बिंदु को ध्यान में रखना होगा कि ईरान में सिनेमा ने डॉक्यूमैंट्री फ़िल्मों के रूप में प्रवेश किया था। चूंकि कैमरा केवल राजाओं के अधिकार में होता था इसलिए शुरूआत में बनने वाली फ़िल्मों में राज दरबार और उनके जीवन पर आधारित घटनाक्रमों की फ़िल्म बनाई जाती थी, वर्षों बीत जाने के बाद कैमरा आम लोगों के हाथ में पहुंचा।

 

 

1950 की शताब्दी के अंत में डॉक्यूमैंट्री फ़िल्मों के निर्माण को व्यवस्थित किया गया और इस विषय में शिक्षा प्राप्त करने वालों ने डॉक्यूमैंट्री फ़िल्मों में काफ़ी दिलचस्पी दिखाई। सिनेमा हॉलों में ईरान की डॉक्यूमैंट्री फ़िल्मों को दिखाया जाने लगा और डॉक्यूमैंट्री फ़िल्मों ने प्रगति के चरण में क़दम रखा। ईरान में बनने वाली डॉक्यूमैंट्री फ़िल्मों को अंतरराष्ट्रीय समारोह में दिखाया जाने लगा और उन्होंने विभिन्न पुरस्कार भी जीते।

लेकिन यह प्रक्रिया बहुत दिनों तक जारी नहीं रही, ईरान के पूर्व तानाशाह के शासन में डॉक्यूमैंट्री फ़िल्मों के निर्माताओं पर तरह तरह से दबाव बनाया जाने लगा। उस काल में केवल उन्हीं फ़िल्मों को प्रदर्शित किया जा सकता था कि जिनमें शाह की प्रशंसा की गई हो।

फ़िल्मों के इतिहास के विशेषज्ञ जमाल उम्मीद ने अपनी किताब ईरानी सिनेमा का इतिहास में लिखा है कि डॉक्यूमैंट्री फ़िल्मों के इतिहास विशेषकर 1940 के दशक में बनने वाली फिल्मों पर नज़र डालने से यह कड़वी सच्चाई सामने आती है कि फ़िल्म निर्माताओं पर विषयों के चयन में भी आज़ाद नहीं थे।

 

 

1963 में शाह के शासन के विरुद्ध 15 ख़ुर्दाद के जनांदोलन के बाद, फ़िल्म उद्योग की प्रगति पर प्रहार किया गया और एडवरटाइज़मैंट एवं रिपोर्टिंग वाली फ़िल्मों को बढ़ावा दिया गया।

वे आगे कहते हैं कि इन फ़िल्मों पर बड़ी मात्रा में धन बर्बाद किया गया जिसका परिणाम केवल वह व्यर्थ अनुभव थे जिन्हें देश एवं विदेश के चाटूकार हासिल करना चाहते थे। इसका परिणाम दर्शकों को धोखे में रखना और ईरानी समाज की अवास्तविक तस्वीर पेश करना था।

 

इतिहास एक ऐसी पाठशाला है कि जिसमें हर किसी के लिए और हर दौर में पाठ है। 1970 का दशक ईरान के इतिहास में बहुत महत्वपूर्ण है, यह वह दौर है कि जब क्रांतिकारियों को इस्लामी क्रांति के रूप में सफलता प्राप्त हुई। ईरान की संस्कृति विशेषकर सिनेमा पर इस क्रांति का काफ़ी प्रभाव पड़ा। इस बीच डॉक्यूमैंट्री फ़िल्मों में काफ़ी परिवर्तन आया।

जनांदोलन के दौरान कैमरे की भूमिका बहुत अहम थी। परवेज़ नबवी, मसऊद जाफ़री जूज़ानी, असग़र बीचारा, मोहम्मद अली नजफ़ी और हुसैन तुराबी उन फ़िल्म निर्माताओं में से थे जिन्होंने क्रांति और जनांदोलन की घटनाक्रमों पर डॉक्यूमैंट्री फ़िल्में बनाईं। उस काल में सुविधाओं की कमी के बावजूद आज 50 घंटों की फ़िल्में आर्काइव में मौजूद हैं, जिन्हें उस समय का महत्वपूर्ण दस्तावेज़ माना जाता है। हुसैन तुराबी की आज़ादी के लिए और मसऊद जूज़ानी की आज़ादी की ओर तथा मजीद जाफ़री क्रांति के घटनाक्रमों एवं सफलता की तस्वीर बहुत ही प्रभावी ढंग से पेश करती हैं।

 

 

क्रांति की सफलता के प्रारम्भिक वर्षों में ग़रीबी, अमीरी जैसे विषयों तथा साम्राज्य विरोधी भावना के साथ सामाजिक फ़िल्मों का निर्माण हुआ। कुछ फ़िल्मों में शाही शासनकाल की डरावनी जेलों का उल्लेख किया जाता था और क्रांतिकारियों से बातचीत की जाती थी और उनकी यादों को दूसरे लोगों तक पहुंचाया जाता था।

 

सामाजिक डॉक्यूमैंट्री फ़िल्में इन सब फ़िल्मों की सूची में सबसे ऊपर थीं। मोहम्मद रज़ा असलानी द्वारा निर्मित बच्चे और शोषण और छोटी सी रोटी कमाने वाले, ऐसी फिल्में हैं जिन्में बच्चों द्वारा सामाजिक तस्वीर को पेश किया गया है। इन फ़िल्मों द्वारा बच्चों के जीवन की परिस्थितियों की आलोचना एवं समीक्षआ की गई।  

   

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