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मंगलवार, 25 नवम्बर 2014 15:17

धार्मिक फ़िल्में

धार्मिक फ़िल्में

सन 1957 में “मुज्तबा राई” का जन्म इस्फ़हान नगर में हुआ था।  उन्होंने आर्ट कालेज से कला के क्षेत्र में शिक्षा ग्रहण की और लघु फ़िल्मों के क्षेत्र में अनुभव प्राप्त करने के बाद फ़िल्में बनाने का कार्य आरंभ किया।  मुज्तबा राई की पहली फ़िल्म का नाम “इंसान व अस्लहे” था।  यह फ़िल्म ईरान पर थोपे गए युद्ध के बारे में थी।  इसे उन्होंने अपनी थीसिस के रूप में प्रस्तुत किया।  बाद में उन्होंने सिनेमा के बारे में पढ़ाने का कार्य आरंभ किया किंतु इसके साथ ही उन्होंने फ़िल्मों के निर्माण का काम भी जारी रखा।  मुज्तबा राई ने कई महत्वपूर्ण एवं प्रशंसनीय फ़िल्में बनाईं।  इन फ़िल्मों को ईरान की धार्मिक या आध्यात्मिक फ़िल्मों की सूचि में रखा जा सकता है।

 

मुज्तबा राई ने जिन फ़िल्मों का निर्देशन किया उनके नाम इस प्रकार हैं, “तवल्लुदे येक परवाने” “जंगजूये पीरूज़” “ग़ज़ाल” “सनोबर” “सफ़र बे हालीवुड” “अस्रे रूज़े दहुम” और तुरंज।  उन्होंने कुछ टीवी फ़िल्मों का भी निरदेशन किया।

 

मुज्तबा राई, धार्मिक फ़िल्मों को विशेष आयाम से देखते हैं।  इस बारे में वे कहते हैं मेरा मानना है कि फ़िल्म बनाने वाले को इस बात का प्रयास करना चाहिए कि वे इस प्रकार की फ़िल्में बनाएं जिससे समाज को लाभ पहुंचता हो।  वह कहते हैं कि फ़िल्म बनाने का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं होना चाहिए।  उनका मानना है कि फिल्म बनाने की शैली को विशेष महत्व प्राप्त है।  मुज्तबा राई कहते हैं कि भ्रष्टाचार के विषय को भी इस प्रकार से प्रस्तुत करना चाहिए कि जिससे फ़िल्म निर्माता और दर्शक दोनों में से कोई भी भ्रष्टाचार में लिप्त न होने पाए।  वे कहते हैं कि यदि फ़िल्म का निर्माण इस शैली में किया जाए तो उसे धार्मिक सिनेमा की सूचि में रखा जा सकता है।

 

इस ईरानी फ़िल्म निर्देशक ने फ़िल्म निर्माण काल के दौरान दो शैलियों को अपनाया।  इस प्रकार उनकी फ़िल्मों को दो भागों में बांटा जा सकता है।  पहली शैली के अन्तर्गत वे फ़िल्में आती हैं जिनमें उन्होंने चित्रों का कम से कम प्रयोग करते हुए सीधे तरीक़े से धार्मिक विषयों और धार्मिक कहानियों को प्रस्तुत किया है।  इस प्रकार की फ़िल्मों में उन्होंने बड़े ही स्पष्ट ढंग से धर्म और मानव जीवन में धर्म की आवश्यकता के संदर्भ में अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है।  इस प्रकार मुज्तबा राई ने दर्शकों को धार्मिक विषयों को सुनने के लिए तैयार किया है।  इस प्रकार की फ़िल्मों में “अस्रे रूज़े दहुम” तथा “इंसान व अस्लहे” का नाम लिया जा सकता है।

 

यह स्पष्ट कर देना उचित होगा कि इन फ़िल्मों की कहानियां स्पष्ट रूप से धर्मों के इतिहास या धार्मिक विषयों को बयान नहीं करतीं बल्कि इन फ़ल्मों में वर्तमान समय के मनुष्य की सोच और आध्यात्मिक विषयों के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को प्रदर्शित किया गया है।  उदाहरण स्वरूप मुज्तबा राई ने 1988 में “इंसान व अस्लहे” नामक फ़िल्म का निर्माण किया था।  यह काल ईरान पर थोपे गए युद्ध का अन्तिम समय था।  फ़िल्म में सैन्य अभियान के दौरान शत्रु के हाथों से एक क्षेत्र को स्वतंत्र कराते दिखाया गया है।  इसमें ईरानी योद्धाओं की आस्था और उनके दृढ़ विश्वास को दिखाया गया है।  इस फ़िल्म को देखकर ईश्वर के मार्ग में बलिदान की भावना का स्पष्ट रूप में आभास किया जा सकता है।

 

इसी प्रकार मुज्तबा राई ने वर्तमान कहानियों के माध्यम से आध्यात्मिक विषयों को स्पष्ट ढंग से प्रस्तुत किया है।  इस प्रकार वे सिनेमा जैसे संचार माध्यम से धर्म को आधुनिक ढ़ंग से पेश करते हैं।  अपनी फ़िल्म “अस्रे रूज़े दहुम” में उन्होंने इस्लामी मूल्यों का उल्लेख किया है।  इसमें वे इराक़ की कहानी के परिप्रेक्ष्य में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के आन्दोलन को प्रदर्शित करते हैं।

 

इस फ़िल्म में दिखाया जाता है कि एक लेडी डाक्टर इराक़ की जनता की सहायता के लिए रेडक्रीसेंट की एक टीम के साथ इराक़ जाती है।  यह लेडी डाक्टर मन में अपनी खोई हुई बहन को ढूंढने का संकल्प रखती है।  इस फ़िल्म में अपरोक्ष रूप में करबला की घटना को प्रस्तुत किया गया है।  फ़िल्म में करबला की घटना, युद्ध के दौरान खोई हुई दो बहनों को मिलाने की भूमिका बनती है।  मुज्तबा राई ने इस फ़िल्म का निर्देषन करबला के शोकाकुल श्रद्धालुओं के बीच किया है।  फ़िल्म को देखकर फ़िल्म निर्माण के बारे में उनकी दक्षता का अनुमान लगाया जा सकता है।

 

मुज्तबा राई की अन्य फ़िल्मों में धर्म, संसार और आध्यात्म को प्रतीकात्मक रूप में प्रस्तुत किया गया है।  इन फ़िल्मों में उन्होंने कहावतों की भाषा का प्रयोग किया है।  इन फ़िल्मों के एक आलोचक का कहना है कि मुज्तबा राई एसे निर्माता हैं जो फ़िल्मों की भाषा को उचित ढंग से समझते हैं।  फ़िल्मों में वे सामान्यतः अपने मन की बात कहते हैं।  उनके भीतर धर्म की जो भावना है उससे उन्होंने अपनी फ़िल्मों को आध्यात्मिक रूप दे दिया है।

 

“तवल्लुदे यक परवाने” “सफ़र बे हालीवुध” और “तुरंज” आदि उनकी फ़िल्में इन्हीं फ़िल्मों में की श्रेणी में आती हैं।  इन फ़िल्मों में कहावत की भाषा का प्रयोग स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

 

“तवल्लुदे येक परवाने” एक धारावाहिक है जो तत्वदर्शिता के विषय पर आधारित है।

 

मुज्तबा राई ने वर्षों के अंतराल के बाद “तवल्लुदे येक परवाने” के निर्माण के साथ पुनः फ़िल्मी दुनिया में प्रवेष किया।  इस बार उन्होंने एसा धारावाहिक बनाया जो आध्यात्मिक होने के साथ प्रतीकात्मक भी था।  इसका विषय धार्मिक था किंतु वह बहुत गूढ़ था।  इसमें दिखाया जाता है कि एक चित्रकार अपनी ख्याति के शिखर के समय मृत्यु के विषय का सामना करता है।  यह उस समय होता है जब वह विदेश से एक चित्र प्रदर्शनी में भाग लेकर स्वदेश वापस आता है।  वह नर्क नाम के उस चित्र से बहुत प्रभावित होता है जिसे उसके एक पुराने दोस्त ने बनाया होता है।  इसके बाद से वह मौत को अपने बहुत निकट महसूस करता है।  मुज्तबा राई अपने विचारों को एक पुराने चित्रकार की पेंटिंग के माध्यम से प्रस्तुत करते हैं।  इसके लिए उन्होंने इस्लामी-ईरानी चित्रकारिता का सहारा लिया है।

 

31वें फ़ज्र फ़िल्म फेसटिवेल में इस फ़िल्म को देखने के बाद कुछ आलोचकों ने इसमें प्रयोग होने वाले धार्मिक विषयों की सराहना की है।       

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