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मंगलवार, 11 नवम्बर 2014 16:10

अर्थपूर्ण सिनेमा-७

अर्थपूर्ण सिनेमा-७

हमने ईरान और विश्व में परिज्ञान के संबंध में बनने वाली फिल्मों के  बारे में चर्चा की थी और हमने यह भी कहा था कि २० वीं शताब्दी में दुनिया के सिनेमा के साथ ईरान में भी इस प्रकार की फिल्में बनाई जाने लगीं।

 

इस प्रकार की फिल्मों में “हामून” सबसे महत्वपूर्ण फिल्म है जिसे दारयूश मेहरजोई ने बनाया है और इस फिल्म को बहुत पसंद किया गया। इस फिल्म को जहां बहुत पसंद किया गया वहीं इस फिल्म में जिन विषयों को बयान किया गया उसका भी काफी विरोध किया गया परंतु समय बीतने के साथ ईरानी सिनेमा ने दर्शा दिया कि उसका महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा।  आज के कार्यक्रम में भी हम मेहरजुई की दूसरी फिल्म के बारे में चर्चा करेंगे।

 

दारयूश मेहरजुई ईरान के उन पुराने फिल्म निर्माताओं में से हैं जो अब भी फिल्म बनाने में सक्रिय हैं और उन्होंने अपने अनुभवों का लाभ उठाकर विभिन्न प्रकार की फिल्में बनाई हैं।

दारयूश मेहरजुई ने नव्वे के दशक में चार फिल्में बनाई और उनमें से हर एक किसी महिला के नाम पर है और उनमें से हर एक में किसी विशेष पहलु से महिला को देखा गया है। इस संबंध में “बानो” नाम की एक फिल्म है जिसमें बारे में मेहरजुई ने कहा है कि इस फिल्म को व्यक्तिगत व्यवहारों के आधार पर बनाया गया है और इसमें पूरब के परिज्ञान को दिखाया गया है पर साथ ही “बानू” फिल्म को पश्चिमी परिज्ञान से भी मिश्रित किया गया है और यह फिल्म जटिल व अस्पष्ट संकेतों से भरी पड़ी है जिसके कारण लोग इस फिल्म से अलग अलग  निष्कर्ष निकालते हैं।

 

 

इस फिल्म का जो मुख्य नायक है वह पूरबी दर्शनशास्त्र  की ओर रुझान रखता है और फिल्म में बताया जाता है कि दर्शनशास्त्र के संबंध में उसका बहुत अध्ययन है और वह दर्शनशास्त्र की किताबों के अध्ययन में लीन है और प्रेमपूर्ण व्यवहार के साथ दूसरों की हाल चाल पूछता है परंतु फिल्म की समाप्ति पर वह इस परिणाम पर पहुंचता है कि किसी पर भरोसा नहीं करना चाहिये और अपने किये पर उसे पछतावा होता है। वास्तव में इस फिल्म में यह दिखाया जाता है कि इस प्रकार का परिज्ञान अंत में बंद गली में पहुंच जाता है।

 

“सारा” “परी” और “लैला” दारयूश मेहरजुई की तीन दूसरी फिल्में हैं और इन तीनों फिल्मों का मुख्य नायक महिला है और इनमें भी पूरब एवं पश्चिम के दर्शनशास्त्र तथा परिज्ञान की ओर संकेत किया गया है और इसमें ईमान तथा त्याग के विषयों को चुनौती दी गयी है।

 

 

विश्व के सिनेमा में नारीवाद और परिज्ञान का प्रचलित होना और समय के प्रसिद्ध उपन्यासों में इन विचारों के प्रभावित होने से चाहे अनचाहे रूप में ईरानी सिनेमा तक यह बातें पहुंच गयीं। मेहरजुई जैसे फिल्म निर्माता ने भी इन विचारों एवं दृष्टिकोणों को एक दूसरे से मिश्रित करने का प्रयास किया क्योंकि मेहरजुई अपनी फिल्मों का आधार उपन्यास को बनाते हैं।

मेहरजुई की फिल्मों में महिलाएं वे इंसान हैं जो बुद्धिजीवी मामलों में बंद गली में पहुंच गयी हैं और वह किसी को प्रभावित नहीं कर सकतीं और वे इस बात के महत्व को अंत में समझ जाती हैं। ये महिलाएं कोहिराग्रस्त वातावरण में रहती हैं और उनकी रौशनफिक्री पश्चिम से जबकि परिज्ञान बौद्धधर्म से प्रभावित है। वास्तव में वे दुनिया की सतही जीवन की भेंट चढ़ गयी हैं। इस फिल्म में जो वातावरण दिखाया गया है विशेषकर ईरान में महिलाओं का, उसमें और वास्तविकता में ज़मीन-आसमान का अंतर है और उन्हें एक प्रकार की पहचानहीनता का सामना होता है।

 

 

इस फिल्म के बाद दारयूश मेहरजुई ने “दरख्ते गुलाबी” नाम की फिल्म बनाई जिसका बहुत स्वागत किया गया और कुछ ने इसे ईरान के फिल्मी इतिहास की एक बेहतरीन फिल्म बताया। इस फिल्म को ईरान की एक साहित्यिक कहानी के आधार पर बनाया गया है। यद्यपि इस फिल्म में अधिकतर बातें प्रेम की हैं परंतु इसमें राजनीतिक और सामाजिक मामलों की भी अनदेखी नहीं की गयी है और ईरान के राजनीतिक इतिहास की ओर बहुत ही अच्छे ढंग से संकेत किया गया है। एक लेखक अपने विरासती बाग़ में जाता है ताकि अपनी अधूरी किताब पूरी करे। वह सोचता है कि किताब लिखने की कला उसके अंदर से समाप्त हो गयी है। उस बाग़ में नाशपाती का भी एक पेड़ होता है। बाग़ का मालिक कहता है कि बहुत अधिक प्रयास करने के बावजूद बाग ने कोई फल नहीं दिया है तो इसके लिए कुछ करना चाहिये। दर्शक पूरी फिल्म में लेखक के साथ हो जाता है। इस फिल्म की स्क्रीप्ट, म्यूज़िक, शूटींग और अभिनय अपने चरम पर है और यह फिल्म न केलव लोगों के मध्य अपना स्थान बना लेती है बल्कि टीका- टिप्पणी का उपहार भी मेहरजुई के लिए लाती है।

 

 

वास्तव में नाशपाती की कहानी रौशन फिक्र की कहानी है कि वह भावनात्मक कारणों के साथ राजनीतिक संघर्ष में शामिल हो जाती है और जब प्रेम का कारण समाप्त हो जाता है तब नाशपाती का पेड़ फलहीन हो जाता है।

 

मेहरजुई गिने- चुने फिल्म निर्माताओं में से हैं जिन्होंने साहित्य के साथ अपने संबंधों को सुरक्षित रखा है और उनकी अधिकांश फिल्मों का आधार साहित्यिक कहानी है। इसके अतिरिक्त वह अध्ययन, और लेखन आदि कार्यों में व्यस्त रहते हैं। उनकी फिल्मों की अधिकांश पटकथायें प्रसिद्ध ईरानी एवं विदेशी लेखकों की रचनाएं होती हैं और शायद उनकी फिल्मों के जारी रहने व पसंद किये जाने का एक महत्वपूर्ण कारण यही मिश्रिण है जो कम ही ईरानी फिल्म निर्माताओं में दिखाई पड़ता है।

मेहरजुई के दार्शनिक विचार ईरान की इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद अधिकतर पारिवारिक मामलों में स्पष्ट हुए और सामने आये हैं।

मेहरजुई की मेलड्रोम फिल्मों का आधार कठिन परिस्थितियां होती हैं जिसमें नायक अपने भविष्य का निर्णय करता है। यह कार्य इस बात का सूचक है कि फिल्म निर्माता इंसान के नीजि व्यक्तित्व पर विशेष ध्यान देता है। इस प्रकार की मेहरजुई की कुछ फिल्मों का जनता ने बहुत स्वागत किया है और उनकी खूब बिक्री हुई।

 

दारयूश मेहरजुई की फिल्मों में काफी उतार चढ़ाव रहा है। उनकी कुछ फिल्मों की कहानी अच्छी थी परंतु अच्छे ढंग से बनाई नहीं गयीं जबकि उनकी कुछ फिल्में औसत दर्जे की रही हैं और उन्हें नशेड़ी या निर्धनता जैसे सामाजिक मामलों पर बनाया गया है। अलबत्ता हमने जैसा कहा कि मेहरजुई ने कुछ बहुत अच्छी फिल्में भी बनाई हैं।

“नारंजीपूश”  मेहरजुई की एक अन्य फिल्म है जिसका मूल विषय पर्यावरण की रक्षा है। पर्यावरण की रक्षा के विचार को एक कहानी के माध्यम से बयान करने के लिए बड़ी दक्षता की आवश्यकता है परंतु खेद के साथ कहना पड़ता है कि कुछ बातों पर सीमा से अधिक ध्यान दिया गया है जो इस बात का कारण बना कि दर्शक न केवल फिल्म के परिणामों की उपेक्षा करता है बल्कि वह फिल्म के मूल लक्ष्य को नहीं समझता है।  

 

 

मेहरजुई की अंतिम फिल्म का नाम “चे खूब कि बरगश्ती” है और यह फिल्म एक सामाजिक कमेडी है। एक साधारण कहानी इस फिल्म की स्टोरी है और इस फिल्म के अलावा दूसरी कमेडी फिल्म में भी इस फिल्म निर्माता को देखा गया है। “चे खूब कि बरगश्ती” फिल्म खुशी के वातावरण के साथ आरंभ होती है। इस फिल्म में उस पुराने मित्र का स्वागत किया जाता है जो कई वर्षों के बाद अपने दोस्तों के पास लौटता है। उस समय परिवार के दूसरे सदस्य होते हैं और पुरानी यादों की बात की जाती है और दर्शक भी इस दृश्य को देखने में लीन हो जाता है। दर्शक इस फिल्म को काफी पसंद करते हैं परंतु इस फिल्म के संबंध में पूर्णरूप से दो भिन्न प्रतिक्रियायें दिखाई पड़ती हैं। कुछ लोग इस फिल्म को एक सफल फिल्म मानते हैं और उनका कहना है कि इस फिल्म में जीवन के अवसरों से अच्छी तरह लाभ उठाने को दिखाया गया है जबकि कुछ लोगों का मानना है कि दारयूश मेहरजुई ने इस फिल्म को मन लगाकर नहीं बनाया है और उसने दूसरी फिल्मों में अपनी लोकप्रियता का लाभ उठाया है तथा एक अच्छी व मज़बूत फिल्म नहीं बनाई है।

 

 

बहरहाल जो चीज़ एक कलाकार और फिल्म निर्माता को टिकाऊ बनाती है वह चीज़ दारयूश मेहरजूई के संबंध में व्यवहारिक हो चुकी है क्योंकि उन्होंने कुछ एसी फिल्में बनाई हैं जो ईरानी सिनेमा के इतिहास में अमर हो गयी हैं। 

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